कागज का वो टुकड़ा….

कागज के उस टुकड़े को दीपा ने आज भी संभाल कर रखा है। उसने बाकायदा इसे अपने कमरे में फ्रेम करके टांगा हुआ है। ये वही कागज का टुकड़ा है, जिसके जरिये एक लड़के ने उससे अपने प्रेम का इजहार किया था। वही प्रेम, जो अब इस कागज के टुकड़े के अलावा जमीन पर कहीं नहीं है। और दीपा भी ये जानती है।

वह ये भी जानती है कि उस कागज में लिखे सारे शब्द, तब झूठे हो गए थे, जब उसके प्रेम को उस लड़के ने सिर्फ इसलिए तोड़ दिया क्योंकि वह दुनिया से नहीं लड़ पाया।

दीपा को पता है कि उस लड़के की शादी होने वाली है और अब वह शायद ही उसे याद करता होगा, लेकिन फिर भी उसने कागज का वो टुकड़ा आज भी संभाल के रखा है। शायद इसलिए कि उसके बेजुबां और न सुनाई देने वालेे प्रेम को किसी ने तो सुना था और समझा था।

वह इस कागज को शायद इसलिए भी संभाल कर रखती है, क्योंकि उसे पता है कि अब उससे शायद ही कोई समाज की आम धारणा के विपरीत और असाधारण प्रेम करने की हिम्मत करे। वह कहती है कि अब यही कागज का टुकड़ा मेरे प्रेम की निशानी है, जिसके सहारे मैं अपने खालीपन को भरने की कोशिश करती हूं। दीपा जन्म से ही मूक-बधिर है।

उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के एक छोटे से गांव की इस लड़की से जब मैं मिला, तो मुझे अंदाजा भी नहीं था कि उसकी खामोशी में कितनी पीड़ा छुपी हुई है।

हंसते-खेलते रहने वाली, लोगांें के शगल का अच्छा साधन और हर काम में अव्वल दीपा उन हजारों मूक-बधिर लड़कियों में से एक है, जिन्हें देखकर लोगों को दया तो आती है, लेकिन उनकी इच्छाएं और मर्जी कभी नहीं पूछी जाती। कम से कम शादी के मामले में तो नहीं। यही दीपा के साथ भी है।

अपनी सांकेतिक भाषा के जरिये दीपा बताती है कि यहां के अन्य मूक-बधिरों की तरह उसकी शादी भी किसी अधेड़ उम्र के व्यक्ति से होगी। ऐेसे व्यक्ति से, जिसकी या तो पत्नी मर चुकी होगी या फिर जिसकी शादी किसी अन्य कारण से नहीं हो रही हो।
कुछ उनसे सिर्फ इसलिए शादी करते हैं क्योंकि उनकी पहली पत्नी से कोई औलाद नहीं हुई, तो उन्हें बच्चे पैदा कर सकने वाला कोई चाहिए होता है।

वह कहती है, ’हमारे सभ्य समाज में किसी भी तरह की विकलांगता का मतलब है कि आप सामान्य जीवन जीने के हकदार नहीं हैं।
लोग मुझे कम अक्ल समझते हैं। शायद इसलिए क्योंकि कई बार मैं उनकी बातें नहीं समझ पाती। लेकिन मैं भी दुनिया को समझती हूं, मेरा भी अपना नजरिया है।’
दीपा को जब भी कागज के उस टुकड़े और उससे प्रेम करने वाले के बारे में पूछा जाता है, तो उसके चेहरे पर मुस्कान पसर जाती है। उससे रिश्ता तोड़ने वाले उस लड़के के लिए उसके चेहरे पर कोई गुस्सा नजर नहीं आता और न ही वह कोई शिकायत करती है।

दीपा कहती है, ’मैं उसे दोष नहीं देती। मैं जानती हूं कि उसने मुझसे सच्चा प्रेम किया था। एक वही तो था, जिसने मुझे एक विकलांग के तौर पर नहीं, बल्कि एक सामान्य इंसान के समान देखा था।
उसने मेरी शारीरिक कमियों को स्वीकार करते हुए ही मुझसे प्रेम का इजहार किया था। उसने दुनिया से लड़ने की कोशिश भी की थी, लेकिन वो अपने परिवार के खिलाफ नहीं जा सका। मुझे उससे कोई शिकायत नहीं है।’

अपने रुंदते गले से और आंखों को भरने से बचाने की कोशिश करते हुए वह कहती है कि भले ही मेरी उससे शादी न हुई हो। भले ही उसने मुझे छोड़ दिया हो, लेकिन मेरा प्रेम उसके लिए हमेशा अमर रहेगा और मेरी दुवाओं में मैं उसके लिए बेहतर जिंदगी की कामना करती रहूंगी।

दीपा ने अब कभी भी शादी न करने का फैसला लिया है। उसने अब खुद को सशक्त बनाकर अपनी शर्तों पर जिदंगी जीने की ठानी है। वह अब अपने आसपास की और इस सभ्य समाज में मौजूद अन्य मूक-बधिरों की सहायता करना चाहती है।
दीपा बताती है कि उत्तराखंड के गांवों में मूक-बधिरों को सामान्य स्कूलों में ही भेज दिया जाता है। जहां उनके लिए कोई विशेष इंतजाम नहीं होते। इस वजह से उनकी पढ़ाई भी ठीक से नहीं हो पाती।
दीपा के मुताबिक ग्रामीणों को मूक-बधिरों के लिए बने विशेष स्कूलों के बारे में भी पता नहीं होता। ऐसे में वह इस काम के लिए आगे आना चाहती है। पढ़ना-लिखना चाहती है और खुद सशक्त बनने के साथ दूसरों को भी सशक्त बनाना चाहती है।
दीपा से मिलने के बाद मुझे एक चीज का अहसास जरूर हुआ कि विकलांग होना, कोई कमजोरी नहीं बल्कि शरीर की उस कमजेारी से उभरना है, जो उन्हें उनकी मर्जी के खिलाफ मिली है।

मुझे यह भी महसूस हुआ कि हम मूक-बधिरों और विकलांगों को दया की नजर से देखने के बदले उन्हें सामान्य इंसान की तरह ही देखें। जरूरत है, तो उनकी उन जरूरतों को पूरा करने की, जिससे वह अपना सामान्य जीवनयापन करने में सक्षम हो सकें।

और प्रेम के मामले में एक अनोखी सीख मिली। और वह यह है कि सच्चा प्रेम वह होता है जो आत्मा से हो, न कि शरीर से।

क्योंकि आत्मा से होने वाला प्रेम शरीर की कमियों को तवज्जो नहीं देता। शायद दीपा के मामले में ये पूरी तरह सच न हो, लेकिन कम से कम दीपा को इसी बहाने प्रेम होने का एहसास तो हुआ।

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