इंसान तो पागलखाने में रहते हैं…

कहने को तो वो एक पागलों का अस्पताल था। जहां हम बीए के दूसरे वर्ष के विद्यार्थियों को अपने प्रोजेक्ट की खातिर दौरा करना था।

हमारे जेहन में पागलों की जो तस्वीर तैयार की गई थी, उसकी वजह से हम थोड़ा डरे जरूर थे, लेकिन ‌पागलों को एक जगह देखने का रोमांच भी था।

हम ५० से ६० विद्यार्थी थे। महाराष्ट्र के थाने जिले के उस इकलौते पागलखाने के जैसे ही गेट खुले, तो हमें कोई पागल नहीं नजर आया। हमनें देखा कि कुछ लोग मरीज जैसी हरी ड्रेस पहने हुए हैं और गार्डन की साफ-सफाई करने में मशगूल हैं। ‌

हम जैसे ही उनके करीब से गुजरे, उन्होंने बहुत ही खूबसूरत मुस्कान के साथ हमारा स्वागत किया। तब ही वहां हमें गाइड करने वाले डॉक्टर मिल गए।

उन्होंने बताया कि ये सभी मानसिक रूप से बीमार थे, लेकिन अब वे सब ठीक हो गए हैं। इस पर हमने प्रश्न पूछा, तो फिर वे घर क्यों नहीं जाते? उन्होंने कहा, ये बेचारे तो जाना चाहते हैं, लेकिन कोई इन्हें लेकर ही जाना नहीं चाहता। हम आगे बढ़े। हमें एक २५ से २६ साल की युवती मिली।

उसने हमारे साथ आई हमारी मैडम का हाथ पकड़कर पूछा, आप मुझे घर ले जाएंगी न? मैडम ने उसका मन रखने के लिए हामी भर दी। जिस पर खुश होकर वो नाचने लगी और अपने अन्य साथियों से कहने लगी, मैं अब घर जाऊंगी, मैं अब घर जाऊंगी।

पागलखाने के इस दौरे के दौरान हमने उन मानसिक रोगियों द्वारा बनाए गए चित्र भी देखे। जिसमें उनकी मन की दशा साफ झलक रही थी। कुछ ने मां की गोद में सो रहे बच्चे की खूबसूरत तस्वीर बनाई थी, तो कुछ ने खुले आसमान का चित्र।

हम उन तस्वीरों में छुपी भावनाओं को समझ पा रहे थे और सिर्फ यही सोच रहे ‌थे कि आखिर ये लोग पागल कैसे हो सकते हैं,जो इतनी खूबसूरती से भावनाओं को कागज पर उकेर सकते हैं।

उस पागलखाने की पूरी व्यवस्‍था उन लोगों के ही ‌हाथ में थी, जिन्हें पागल करार देकर दुनिया ने इस पागलखाने में भेज दिया है या फिर फुटपाथ पर मरने के लिए छोड़ दिया,जहां से अस्पताल प्रशासन ने उन्हें लाया है।

वही खाना बनाने वाले थे, वही कपड़े धोने वाले और अन्य सभी छोटे-बड़े काम वे पागल ही कर रहे थे। इसके बाद हम पागलखाने के उस हिस्से में पहुंचे जहां कुछ मानसिक पीढ़ितों को सलाखों के पीछे रखा गया था।

हमने डॉक्टर साहब से इनके बारे में पूछा, तो उन्होंने कहा कि इन्होंने कई बार खुद को और अन्य को चोट पहुंचाने की कोशिश की है, इसीलिए इन्हें जेल में रखा गया है।

हम डॉक्टर से बात कर ही रहे थे कि एक व्यक्ति अचानक पीछे से सलाखों के सामने आया और मराठी भाषा में कहने लगा, ”अरे माई, अब तो आ जा, क्या तब आएगी जब मैं मर जाऊंगा?”

इस पूरे दौरे के दौरान हम वहां पागल ढूंढ़ते रहे। वो पागल जिनकी छवी हमारे जेहन में कुछ और ही बनी थी। ऐसे लोग जो बेवजह हंसते रहते हैं, कुछ भी ऊल-झलूल करते रहते हैं और छोटी-छोटी बातों पर आप पर हमला भी कर दें, लेकिन हमें कोई भी ऐसा पागल नहीं दिखा।

हम लोगों को देखकर वे खुशी से फूले नहीं समा रहे थे। शायद उन्हें लग रहा था कि हम उन्हें लेने आए हैं पर सच्चाई यही थी कि उन्हें अब हमेशा वहीं रहना है। क्योंकि इस इंसानों के समाज में इंसानियत के लिए जगह नहीं बची है अब।

बचेगी भी कैसे, क्योंकि जिनमें इन्सानियत पनपी है, उन्हें हमने पागल करार देकर पागलखाने में डाल दिया है।

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