ये शख्स जेल जाना चाहता है, वजह जान आ जाएगा रोना

पुष्कर दत्त भट्ट ने अपनी जवानी का 20 साल से भी ज्यादा वक्त जेल में गुजारा है. पिछले करीब 6 महीने पहले वह जेल से रिहा हुआ है, लेकिन वह फिर जेल जाना चाहता है.

उसने जिला प्रशासन को चेतावनी दी है कि अगर उसकी मांग नहीं मानी जाती है, तो वह आत्महत्या कर देगा. पुष्कर ही नहीं उसकी जगह और कोई भी होता, तो शायद वह भी यही करता.

दरअसल 20 साल पहले एक झगड़े के दौरान पुष्कर ने अपनी पत्नी और बच्चे की हत्या कर दी थी. उसे इस मामले में दोषी पाया गया और उम्रकैद की सजा हुई. पिछले साल जब वह जेल से बाहर आया, तो वह सीधे पिथौरागढ़ स्थित अपने गांव ‘बस्टाडी’ पहुंचा.

लेक‍िन जब वह अपने गांव पहुंचा, तो यहां उसके अलावा कोई और इंसान नहीं था. जुलाई 2016 में आई आपदा में इस गांव के 21 लोग बह गए थे. तब से इस गांव का कोई भी शख्स यहां नहीं रहना चाहता.

यही वजह है कि यहां रहने वाले सारे लोग गांव छोड़कर या तो दूसरी जगहों पर बस गए हैं या फिर शहर चले गए हैं.

करीब 20 साल बाद लौटा पुष्कर यहां पिछले 6 महीने से रह रहा है, लेकिन अब उसका धैर्य भी जवाब दे गया है. उसने जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि उसे वापस जेल भेज दिया जाए.

उसका कहना है कि जेल में कम से कम उसके साथ बात करने वाले हैं और खाने-पीने के साथ ही सुरक्षा तो मुहैया है. यहां अपने गांव में उसे इनमें से कोई भी चीज नहीं मिल रही है.

उसने अपनी एप्ल‍िकेशन में कहा है कि अब वह उस गांव में अकेले नहीं रह सकता. अपने आवेदन में उसने सरकार से कहा है कि या तो प्रशासन उसके गांव को बसाने के लिए प्रयास करे या फिर उसे वापस जेल भेज दिया जाए.

पुष्कर ने अपनी आपबीती सुनाई है. उसने बताया कि उसका वो गांव अब खंडहर बन चुका है. वहां जंगली जानवर खुलेआम घूमते हैं.

किसी भी दूसरे इंसान की वहां आवाज नहीं गूंजती है और उस सूनेपन व अकेलेपन में जीना उसके लिए काफी ज्यादा मुश्क‍िल हो गया है.

उसका कहना है कि उसने कई बार प्रशासन को आवेदन भेजा है, लेक‍िन इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. अब उसने कहा है कि अगर उसकी मांग नहीं मानी जाती है तो वह आत्महत्या कर लेगा, लेक‍िन उस गांव में अकेले नहीं रहेगा.

यह हाल पुष्कर के गांव बस्टाडी का ही नहीं, बल्क‍ि उत्तराखंड के 900 से भी ज्यादा गांवों का है. जहां अब इंसानों की आवाजें नहीं गूंजती हैं. कुछ ऐसे गांव हैं, जहां अब सिर्फ बुजुर्ग रह गए हैं और सब लोग शहरों की तरफ पलायन कर चुके हैं.

पिछले 17 सालों से उत्तराखंड को इंतजार है पलायन के दर्द से उभरने का, लेक‍िन ये दर्द खत्म होने की बजाय बढ़ता ही जा रहा है. डर तो यह लगता है कि कहीं ये पीड़ा कैंसर बनकर पूरे उत्तराखंड को खोखला न कर दे.

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