उत्तराखंड की इस घस्येरी ने वो कर दिखाया, जो हम सोच भी नहीं सकते

‘लड़की है. पढ़-लिखकर क्या करेगी. इसे तो घास ही काटना है.’ उत्तराखंड के ग्रामीण भाग में ज्यादातर मां-बाप अपनी बेट‍ियों को कुछ इसी अंदाज में तैयार करते हैं. इसका मकसद यह होता है कि वह गाय-भैंस के लिए घास लाए और खेतों में काम करे. लेक‍िन जिन लोगों को लगता है कि लड़की का जन्म सिर्फ इसीलिए होता है कि वह सिर्फ घास काटेगी और घर संभालेगी, तो उन्हें बागेश्वर की पूजा से मिलने की जरूरत है.

ऐसे ऊंचा किया नाम
पहाड़ की अन्य आम लड़क‍ियों की तरह पूजा मेहरा भी बागेश्वर के अपने तेहीहाट गांव में घास काटने जाती है. खेतों में अपने मां-बाप की मदद करती है, लेक‍िन उसने जो क‍िया है, वह बहुत खास है. घास काट कर और खेतों में काम कर गुजारा करने वाले परिवार की बेटी ने दुनिया के सबसे ऊंचे पर्वत एवरेस्ट की चढ़ाई कर नाम कमाया है.

Pooja Mehra

पूजा मेहरा

रक्षा मंत्री ने किया सम्मानित
बात मई, 2016 की है. जब पूजा मेहरा ने एनसीसी के अपने 9 साथ‍ियों के साथ एवरेस्ट को फतह किया. 26 जनवरी, 2017 को पूजा मेहरा समेत उनकी टीम को तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर परिकर ने ‘रक्षा मंत्री पदक’ से सम्मानित किया. अब 20 साल की हो चुकी पूजा ने महज 18 साल की उम्र में यह कारनामा कर दिखाया, लेक‍िन यह इतना आसान भी नहीं था.

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NCC की वो टीम, जिसमें पूजा मेहरा भी शाम‍िल थीं

 

खेती-बाड़ी के साथ खुद को किया तैयार
पूजा और उनके पिता जी खेतों में काम करके अपना गुजारा करते हैं. उनके पिता घर का खर्चा चलाने के लिए कभी-कभार ड्राइवरी भी किया करते हैं. हर आम पहाड़ी लड़की की तरह ही पूजा भी घास लाने और खेतों में अपने माता-पिता की मदद करने में जुटी रहती है, लेक‍िन दूसरी ग्रामीण लड़कियों और पूजा में सिर्फ इतना फर्क है कि यह लड़की सपने देखती है और उन्हें सच करने के लिए जी जान लड़ा देती है.

श‍िक्षकों से सुना और ठान लिया
स्कूल में कबड्डी खेलने में माहिर पूजा ने एक बार अपने श‍िक्षकों से एवरेस्ट के बारे में सुना. उसने तब ही निश्चय कर ल‍िया कि वह एक दिन इसकी चोटी पर पहुंचकर दम लेगी. पूजा हर दिन तकरीबन 10 किलोमीटर की दौड़ लगाती थी. इसके बाद कम से कम एक घंटे तक व्यायाम करती थी. इन चीजों से निपटने के बाद वह अपने माता-पिता के साथ खेतों में उनका हाथ बंटाती. घास लाती और घर का काम भी करती.

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अपने माता-पिता के साथ

सामान्य खान-पान से ही कि‍या खुद को मजबूत
किसान और गरीब परिवार से होने की वजह से उसे कभी अन्य पर्वतारोहियों की तरह डाइट प्लान रखने का मौका नहीं मिला. वह रोजाना एक गिलास दूध और सामान्य भोजन के बूते ही अपनी डाइट पूरी करती थी. लेक‍िन फिर भी 2015 में उसने राज्य के औली में स्थ‍ित त्रिशूल पर्वत (23,360 फुट) की चढ़ाई की. इसके बाद उसने हिमाचल प्रदेश के मनाली में स्थ‍ित नाग टिब्बा (19,688 फुट) की चढ़ाई की.

मुसीबत नहीं हुई खत्म
इसकी बदौलत ही पूजा को नेशनल कैडेट कॉर्प्स की उस टीम में चुना गया, जिसे एवरेस्ट फतह करना था. लेक‍िन इसके लिए अपने परिवार और गांव वालों को मनाना उसके लिए आसान नहीं था. लड़की है. इसे ऐसे अकेले नहीं जाने देना चाहिए…. न जाने क्या-क्या वजहें गिनाई गईं पूजा को वहां न भेजने के लिए.

लेक‍िन आख‍िर में अपने श‍िक्षकों की मदद से पूजा  परिवार को मनाने में कामयाब हुई और करीब एक महीने के कड़े प्रश‍िक्षण के बाद पूजा ने एनसीसी के अपने सदस्यों के साथ मई, 2016 में माऊंट एवरेस्ट फतह किया. पूजा आज भी खेतों में काम करती है. घास लाती है, लेकिन अब वह एक सेलेब्रिटी बन चुकी है. पूरे बागेश्वर में उसका नाम है. पूजा मेहरा अब सेना में भर्ती होना चाहती हैं और वह इसकी तैयारी में जुटी हुई हैं.

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पूजा बागेश्वर की हीरो बन चुकी हैं

पूजा से सीखने की जरूरत
पूजा मेहरा न सिर्फ हम सबके लिए एक प्रेरणा हैं, बल्क‍ि वह उन लोगों की भी आंखें खोलती हैं, जो कहते हैं कि लड़क‍ियों का जन्म घास काटने के लिए हुआ है. उसे तो घर ही संभालना है और बच्चे पैदा करना है. ये सोच पहाड़ के मां-बाप ही न‍हीं, बल्क‍ि यहां की अध‍िकतर लड़क‍ियों के दिमाग में भी बैठी हुई है.

यही वजह है कि वे कभी सपना नहीं देखतीं. और देखतीं भी हैं, तो वह किसी अच्छे लड़के से शादी कर शहर जाने का. उम्मीद है कि पूजा मेहरा का उदाहरण उन्हें इस सोच से बाहर निकलने में मदद करेगा.

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