अच्छे दिन आने वाले हैं?

वो कहते हैं अच्छे दिन आने वाले हैं.
और मैं सोचता हूं कब और कैसे आएंगे?

क्या वो बड़े महानगरों को जोड़नेवाली,
उन मेट्रो ट्रेनों में बैठकर आएंगे?
जो मेरे इन दूर-दूराज के गांवों तक नहीं पहुंचेगी.
क्या वो उन बड़े-बड़े आईआईटी कॉलेजों से निकलेंगे?
जिनके बारे में मैंने सिर्फ सुना भर है.
लेकिन कभी उन्हें देख तक भी नहीं पाऊंगा.
क्या वो शहर की उन चिकनी सड़कों से पहुंच पाएंगे,
मेरे गांव तक पहुंचने वाले ऊबड़-खाबड़ रास्ते से?

क्या वो अच्छे दिन पहुंच पाएंगे उत्तराखंड के उन गांवों में,
जहां आजादी से लेकर अभी तक कोई नेता नहीं पहुंचा है.
क्या वो पहुंच पाएंगे झारखंड के उन गांवों में,
जहां कोयला तो करोड़ों का है, लेकिन इन्सान की कीमत नहीं।
क्या वो पहुंच पाएंगे राजस्‍थान के उन गांवों में,
जहां लोग मीलों से पानी लेकर आते हैं और वो भी खारा।
क्या वो पहुंच पाएंगे उस भारत तक,
जो आज भी गांवों में है और इंतजार कर रहा है,
अच्छे दिनों का.

ये अच्छे ‌दिन, जो बनाए हैं मीडिया और फेसबुक ने
इसे नहीं दिखते वे बुरे दिन, जिनसे भारत आज भी जूझ रहा है.
ये अच्छे दिनों का सपना दिखाया है जिन नेताओं ने
उनके लिए गरीब की भूख से ज्यादा जरूरी है डेवलपमेंट.
डेवलपमेंट, वो भी किसका? इंडिया का, भारत का नहीं।
और हम उसी दिखावटी डेवलपमेंट के पीछे भूल रहे हैं,
आज भी भूख से मर रहा है भारत।
और हम कह रहे हैं….
अच्छे दिन आने वाले हैं….
क्या सच में?

                                                        – शायर दिलशाद

 

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