उत्तराखंड बजट: इं‍ग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे के साथ ‘मातृभाषा स्पीक‍िंग डे’ भी हो जाए तो…

उत्तराखंड सरकार ने गुरुवार को वर्ष 2018-19 के लिए 45,585 करोड़ रुपये का बजट पेश किया. वित्त मंत्री प्रकाश पंत ने गैरसैंण विधानसभा में यह बजट पेश किया. इसमें जहां सबसे ज्यादा फोकस किसानों पर रखा गया है, वहीं, गैरसैंण और माताओं व श‍िशुओं के साथ ही शिक्षा के क्षेत्र के लिए भी कई प्रावधान किए गए हैं. इन प्रावधानों में से ही एक है, ‘इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे’.

‘इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे’
बजट में क्या-क्या खास रहा और राज्य के निवासी को इससे क्या मिला. इसका विश्लेषण और समीक्षा तो आपने समाचार साइटों पर पढ़ लिया होगा, लेकिन एक अहम घोषणा जो इस बजट में की गई है. हम आपका ध्यान उस तरफ खींचना चाहते हैं. बजट में प्रावधान किया गया है कि हर शन‍िवार को ‘इंग्ल‍िश स्पीकिंग डे’ मनाया जाएगा.

अंग्रेजी तो बोल लेंगे, लेकिन पहाड़ी कब
कहने का मतलब यह है कि इस दिन हर स्कूल में ‘इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग क्लासेज’ हो सकती हैं. इसके साथ ही छात्रों को अंग्रेजी बोलने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा. यह अपने आप में एक सराहनीय कदम है. अंग्रेजी आज के कारोबार जगत की अहम भाषा बन चुकी है, लेक‍िन इस प्रस्ताव को रखने के दौरान हमारी सरकार यह भूल गई कि हमारी मातृभाषा को इससे ज्यादा संरक्षण की जरूरत है.

‘मातृभाषा स्पीकिंग डे’ की है जरूरत
जैसे हमने ‘इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे’ रखा है, क्या इस तर्ज पर ‘मातृभाषा स्पीकिंग डे’ नहीं रखा जा सकता था. पहाड़ छोड़कर मैदान आ चुके लोग अब धीरे-धीरे अपनी मातृभाषा गढ़वाली, कुमाऊंनी व जौनसारी भूलते जा रहे हैं. ज्यादातर परिवार अपने घर में बच्चों से अपनी भाषा में बात करना भूल रहे हैं.

नहीं है कोई क्लास
अंग्रेजी तो वे स्कूल में भी सीख लेते हैं, लेकिन उत्तराखंडी भाषाओं के लिए अभी तक कोई क्लास नहीं लगती है. न ही इसे बच्चों को पढ़ाने के लिए पुख्ता इंतजाम ही राज्य में हैं. बजट में भी कोई ऐसी खास घोषणा नहीं की गई है, जिससे यह राहत हो कि राज्य में मातृभाषाओं को बढ़ावा मिल रहा है.

लुप्त होने की कगार पर हमारी भाषा
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक गढ़वाली दुनिया की उन भाषाओं में शामिल हो गई है, जो खत्म होने की कगार पर हैं. यूनेस्को ने इस गढ़वाली अर्थात गढ़वाली और कुमाऊंनी दोनों भाषाओं को ‘वलनरेबल’ श्रेणी में रखा है. इसका मतलब यह है कि ये भाषाएं बच्चे घर पर तो बोलते हैं, लेक‍िन आम बोलचाल में इनका इस्तेमाल नहीं करते हैं.

सिर्फ 27 लाख लोग बोलते हैं यह भाषा
यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड की करीब 1.80 करोड़ की जनसंख्या में से सिर्फ 27 लाख, 9 हजार 5 सौ लोग इन भाषाओं में बात करते हैं. धीरे-धीरे इस भाषा में बोलने वालों की तादाद घट रही है. अगर प्रयास नहीं किए गए, तो एक दिन यह लुप्त हो जाएगी.

ऐसे में सरकार को चाहिए कि इंग्ल‍िश स्पीक‍िंग डे के जैसे ही ‘गढ़वाली अथवा कुमाऊंनी स्पीकिंग डे’ भी रखा जाए, तो शायद अपनी मातृभाषा को भी कुछ बढ़ावा मिल सके.

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