गौरा देवी… गूगल ने दी श्रद्धांजलि, क्या आपको याद है ये महिला?

सर्च इंजन गूगल ने 26 मार्च यानी सोमवार को गौरा देवी को याद किया. गूगल ने अपने चिर पर‍िच‍ित अंदाज में डूडल बनाकर गौरा देवी और उनके उस आंदोलन को याद किया, जिसे उन्होंने अपना मायका बचाने के लिए शुरू किया था. जी हां… गूगल को जिसने याद किया… क्या वो आपको याद हैं?

चिपको आंदोलन की शुरुआत की थी
जब भी पर्यावरण की रक्षा की बात होती है, तो जेहन में सबसे पहले नाम आता है, ‘चिपको आंदोलन’ का. इस आंदोलन ने सुंदरलाल बहुगुणा और चंडी प्रसाद भट्ट समेत कई पर्यावरणविदों को जन्म दिया. लेकिन इस आंदोलन की शुरुआत गौरा देवी ने की. और आज ही के दिन यानी 26 मार्च को इस आंदोलन की शुरुआत हुई थी.

gaura devi chipko movment

गौरा देवी

पेड़ों को बचाने के लिए लगा दी जान की बाजी
चमोली जिले के रैणी गांव के जंगल में ढाई हजार पेड़ों को काटने की नीलामी की गई. प्रशासन ने ठेकेदारों को पेड़ों को काटने की इजाजत दे दी. लेक‍िन जब ठेकेदार पेड़ काटने पहुंचे, तो उन्हें गौरा देवी समेत अन्य महिलाओं के विरोध का सामना करना पड़ा. कई धमक‍ियां और उन्हें डराने के बाद भी जब वह नहीं मानीं तो ठेकेदारों को हार माननी पड़ी और वे वापस चले गए.

प्रशासन की चालाकी नहीं आई काम
26 मार्च, 1974 का दिन था. प्रशासन को यह पता था कि गांव के लोग पेड़ काटने नहीं देंगे. ग्रामीणों के विरोध से बचने के लिए प्रशासन ने 26 मार्च को सड़क बनाए जाने की वजह से हुई क्षतिपूर्ति का मुआवजा देने की तारीख तय की. रैणी गांव के सारे मर्द मुआवजा लेने की खातिर गांव से बाहर चले गए. इस बीच, वन विभाग ने ठेकेदारों को निर्देश दे दिया कि वे पेड़ काट लें.

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महिलाओं ने पेड़ों को लगाया गले

लेक‍िन इसका न था उन्हें अंदाजा
इस तरह उन्होंने सोचा कि गांव के सभी मर्द बाहर आ गए हैं. कोई भी अब विरोध नहीं करेगा, लेक‍िन उन्हें मुंह की खानी पड़ी. ठेकेदार जब इन पेड़ों को काटने के लिए जंगल में पहुंचे, तो सबसे पहले गौरा देवी ने उन्हें रोका. गौरा ने कहा, ” भाइयों, जंगल हमारा मायका है. इसे काट दोगे तो हमारे गांव में बाढ़ आ जाएगी. हमें इनसे जड़ी-बूटी मिलती है. आप खाना खा लीजिए और फिर जब हमारे घर के मर्द आ जाएंगे, तो उनसे बातचीत कर लेना.”

‘चलाओ गोली मेरे सीने पर’
ठेकेदारों और वन विभाग के अध‍िकारियों ने गौरा की बात मानने की बजाय उन्हें डराया धमकाया और गोली चला देनी की चेतावनी दी. इस पर गौरा ने कहा, ” तो चलाओ गोली. सबसे पहले मैं गोली खाऊंगी, लेक‍िन पेड़ नहीं काटने दूंगी.” गौरा का साहस देखकर उनके साथ पहुंची अन्य महिलाओं ने भी साहस दिखाया और उन सबने पेड़ को गले लगा लिया.

ऐसे हुई आंदोलन की शुरुआत
पेड़ को गले लगाकर सभी महिलाओं ने कहा, ”अगर आपको पेड़ काटने ही हैं, तो पहले हमें काटो, उसके बाद पेड़ काटकर ले जाओ.” महिलाओं का रोष देखकर ठेकेदार और वन विभाग के अध‍िकारी लौट गए. इस तरह गौरा के साहस की बदौलत उनका मायका बच गया. गौरा के इस साहस की खबर जैसे ही राज्य के अन्य कोनों में फैली, वैसे ही उत्तराखंड के अन्य भागों में महिलाओं ने पेड़ कटान का विरोध शुरू कर दिया.

पूरे देश में फैली आग
धीरे-धीरे उत्तराखंड से निकलकर यह आंदोलन राजस्थान, मध्य प्रदेश समेत देश के अन्य भागों में पहुंच गया और जहां भी पेड़ कटान की कोश‍िश हुई, तो लोगों ने पेड़ों को गले लगाकर विरोध जताया. प्रशासन ने इसके आगे झुककर हार मानी और इस तरह पेड़ बच गए.

कौन थीं गौरा देवी?
गौरा देवी चमोली गढ़वाल के लाटा गांव की थीं. 1925 में जन्मी गौरा देवी का महज 11 साल की उम्र में विवाह हो गया था. गौरा ने सिर्फ 5वीं कक्षा तक पढ़ाई की थी. उनकी शादी रैंणी गांव के मेहरबान सिंह से हुई थी. रैंणी भोटिया (तोलछा) का स्थायी आवासीय गांव था. इतने बड़े आंदोलन की सूत्रधार गौरा देवीं के जीवन के आख‍िरी दिन बड़ी तकलीफ में गुजरे.

तकलीफ में गुजरे जिंदगी के आख‍िरी दिन
लंबे समय तक बीमार रहने के बाद 1991 में उनकी मृत्य हो गई, लेकिन जीवित रहने के दौरान और बीमारी से जूझने के वक्त राज्य सरकार (तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ) ने उनकी कोई मदद नहीं की. और इस तरह अंत हुआ एक ऐसे सूरज का, जिसने अपनी रौशनी से पर्यावरण को सुरक्ष‍ित बनाने का आंदोलन शुरू किया.

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