… और उसको सूरज दीदी ने रास्ता दिखाया

सास-बहू के रिश्तों में खटास-मिठास का पुराना नाता है, लेकिन कई घरों में सास बहू की जान की दुश्मन बन जाती हैं. उत्तराखंड की ऐसी ही एक लोककथा है. यह लोककथा तब की है, जब लड़क‍ियों की शादी जंगलों पार होती थी. ऐसे में अपने मायके जाने के लिए उसे सालों तक इंतजार करना पड़ता.

एक गांव की बात है. लछ‍िमा की शादी हुए एक साल से भी ज्यादा वक्त गुजर चुका था. उसे मायके की खुद सताने लगी थी. एक द‍िन उसने अपनी सास से कहा कि वह बसंत पंचमी के दिन अपने मायके जाना चाहती है. उसकी सास उसके साथ कभी अच्छा व्यवहार नहीं करती थी. वह अपनी बहू को खुश देखती, तो उसका जिया जल उठता था.

एक दिन लछ‍िमा ने अपनी सास से कहा, ” सासु जी, मैं बसंत पंचमी के दिन अपने मायके जाना चाहती हूं.” इस पर सास ने कहा, ”जरूर चले जाना बहू, लेक‍िन अपना काम निपटा कर. ”

बसतं पंचमी आने में 7 दिन बचे हुए थे. सास रोज उसे नये-नये काम में उलझा लेती थी. हर दिन उसे देह तोड़ काम करवाती थी. इस वजह से वह शाम तक थककर चूर हो जाती थी. सातवां दिन आया. लछ‍िमा मायका जाने के लिए तैयार हो रही थी कि तभी उसकी सास ने उसे कई काम बता दिए.

बसंत पंचमी का दिन आया. बहू ने अपनी सास से पूछा, ”मैं मायके जाऊं?” इस पर सास ने उसे कई काम बता दिए. उसने कहा क‍ि आज शाम को चली जाना, ले‍क‍िन उससे पहले दो पिड़ै धान कूट ले. दो पिड़ै गेंहू पीसकर ला दे. जानवरों के नीचे पड़ी गोबर (म्वाल) खेतों में डाल आ. इसके साथ ही कपड़े धो कर जाना. ” बहू ने दुखी आवाज में कहा, ”ठीक है करती हूं.”

जैसे-तैसे उसने सारे काम निपटाए. अब धान कूटने की बारी थी. वह थककर चूर हो चुकी थी. शाम होने को आई थी. वह धान साफ करने की तैयारी कर रही थी, वैसे ही सास ने मूसल छुपा लिया. सास की यह हरकत वहां डाल पर बैठी गोरैया ने देख ली थी. मूसल न मिलने की वजह से बहू का वियोग बढ़ने लगा था. उसे लगा, वह आज भी मायके नहीं जा पाएगी.

इतने पर गौरैया ने जोर-जोर से शोर करना शुरू कर दिया. गौरैया की आवाज सुनकर वहां सैकड़ों पंछी जमा हो गए. पंछ‍ियों ने चंद मिनटों में चावल से भूसा अलग कर दिया. लछ‍िमा खुश हुई. उसकी सास को यह देखकर अचरज होने के साथ ही दुख हुआ. उसने फिर लछ‍िमा को काम सौंप दिया.

इस बार उसने बहू को जंगल में जाकर घास काटकर लाने को कहा. सूरज ढलने की तैयारी कर रहा था. वह जंगल में पहुंची तो रोने लगी. उसने सूरज दीदी से रोते-रोते अपील की, ” ऐ सूरज दीदी, मुझे मायके जाना है. तू अस्त मत होना. मुझे भी उस पहाड़ी के पार साथ ले चलना.” भगवान ने जैसे उसकी बात सुन ली हो. सूरज उसके सामने आसमान में स्तब्ध रहा. वहीं, दूसरी तरफ, उसने देखा क‍ि उसका घास चूहों के एक झुंड ने कुतरकर अलग रख दिया है.

उसने वह घास उठाई और अपने घर चली गई. सास के पास काम बताने को अब कुछ रह नहीं गया था. शाम हो आई थी. लछ‍िमा ने फटा-फट पैर दौड़ाने शुरू क‍िए. उसे लगा, सूरज डूब गया है, लेकिन वह उसके इंतजार में जंगल में थमा हुआ था. वह खुशी-खुशी सूरज की रोशनी में उस घनघोर जंगल से निकल और अपने मायके पहुंच गई.

यहां वह अपने मां-बाप, भाई-बहनों से मिली. उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था. लेकिन इस दौरान वह सूरज को धन्यवाद कहना भूल गई और सूरज डूब चुका था. यह देखकर उसने सूरज को पुकारा, ”दिन दीदी जाग…जाग…”

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