हां, मैं पलायन करना चाहती हूं…

उत्तराखंड में दिन-प्रतिदिन पलायन बढ़ता जा रहा है. कुछ रिपोर्ट्स की मानें तो यहां के 900 से भी ज्यादा गांव खाली हो चुके हैं. हर तरफ पलायन को रोकने के लिए बहस चल रही है. शहरों में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है. इन कार्यक्रमों में वही लोग पलायन को लेकर चिंता जता रहे हैं, जो सालों पहले पलायन कर दिल्ली-मुंबई बस गए हैं. लेक‍िन मैं उत्तराखंड के एक छोटे से गांव की रहने वाली हूं और मैं पलायन करना चाहती हूं. इसलिए नहीं कि मुझे शहर की चकाचौंध से प्यार है, बल्क‍ि यहां मेरे सामने कई मजबूरियां खड़ी हैं, जो पिछले 17 सालों से अभी तक नहीं सुलझी हैं.

न इलाज-न काज:
मेरे पलायन करने का फैसला लेने की सबसे बड़ी वजह है, पहाड़ में इलाज और काज का इंतजाम न होना. गांव में झोलाछाप डॉक्टरों के अलावा किसी की मौजूदगी नहीं है. आपातकालीन स्थ‍िति में कई किलोमीटर पैदल चलकर मरीज को अस्पताल पहुंचाना पड़ता है. न सुगम रास्ते और न ही सुगम यातायात. ऐसे में आपातकालीन स्थ‍िति में मरीज का अस्पताल पहुंचने से पहले ही इश्वर को प्र‍िय होने की आशंका सबसे ज्यादा रहती है.

दूसरी तरफ, रोजगार के मौके भी यहां न के बराबर हैं. इसकी वजह से हमारे घर के पुरुषों को परदेश जाना ही पड़ता है. खेती-बाड़ी में भी कुछ नहीं निकलता. अगर निकलता भी है, तो जरूर कृष‍ि श‍िक्षण की व्यवस्था न होने की वजह से उसका फायदा उठाने में हम सक्षम नहीं हैं. एक महिला अगर कुछ काम-काम करना चाहती है, तो उसके पास भी विकल्प सीमित हैं.migration in uttrakhand

मेहनत दुगुनी, फायदा न के बराबर:
खेती-बाड़ी की बात करें, तो यहां मेहनत तो दु्गुनी है, लेकिन हासिल कुछ भी नहीं. मुझ जैसी उत्तराखंड की सैकड़ों महिलाएं तड़के सुबह खेतों पर काम के लिए निकल जाती हैं और शाम तक ही घर आ पाती हैं. हर रोज इतनी कड़ी मेहनत करने के बाद भी इतना गेहूं-चावल नहीं मिलता, जिससे परिवार का गुजारा भी हो सके.

ग्रामीण भागों में धीरे-धीरे पशुपालन और बकरी पालन व खेती-बाड़ी समेत अन्य चीजों से लोगों ने मुख मोड़ना शुरू कर दिया है. यहां कृष‍िनुमा खेत बंजर होने लगे हैं. इसका किसी को दुख भी नहीं है. क्योंकि सरकार इस मामले में कुछ करने की इच्छुक नजर नहीं आती. उनकी योजनाएं देहरादून की अस्थायी राजधानी से पहाड़ नहीं चढ़ पाती हैं.Pooja Mehra3

इंसान ही नहीं, जानवरों का भी डर:
जंगलों से उत्तराखंड के आम आदमी का गहरा नाता है. महिलाओं को लकड़ी, घास और बांझ लाने के लिए हर दिन जंगल जाना पड़ता है. ऐसे में गुलदार और भालू के हमलों में महिलाओं की मौत होना यहां आम बात है. यही नहीं, अब तो गुलदार गांव में भी घुसने शुरू हो गए हैं. इस संघर्ष में हमेशा नुकसान हमारा ही हुआ है.

उत्तराखंड से परदेश गए लोग भले ही कम पहाड़ चढ़ते हों, लेकिन मैदान की गंदग‍ियों ने पहाड़ की चढ़ाई करनी शुरू कर दी है. महिलाओं पर अत्याचार और अन्य अप्रि‍य घटनाएं, जो पहले कम ही सुनाई देती थीं, अब हर रोज सुनाई देने लगी हैं.budget

जब तक सरकार और शहर में बैठा इस राज्य का आम आदमी इन समस्याओं का समाधान नहीं निकालता, तब तक आप पलायन रोकने का सिर्फ सपना देख सकते हैं. इंसान की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने पर जब सरकर का फोकस होगा, तब ही पलायन रुकेगा और पहाड़ की दशा सुधरेगी.

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