क्या सिर्फ YouTube के सहारे ही चलेगा उत्तराखंडी सिनेमा?

भारत में ज्यादातर राज्यों की अपनी एक फिल्म इंडस्ट्री है, जो अपने बलबूते पर फल-फूल रही है, लेकिन एक ऐसा भी राज्य है, जिसकी फिल्म इंडस्ट्री को ऑनलाइन वीडिया साइट यूट्यूब के अलावा किसी का सहारा नहीं है. और वो है उत्तराखंड.

महाराष्ट्र में मराठी सिनेमा धूम मचा रहा है. माधुरी दीक्ष‍ित, सलमान खान और रितेश देशमुख व नाना पाटेकर जैसे सितारे मराठी फिल्मों में अभ‍िनय कर रहे हैं. मराठी फिल्में ऑस्कर तक का रास्ता तय कर रही हैं. वहीं, पश्च‍िम बंगाल और साउथ के सिनेमा की बात करें, तो ये पहले से ही एक मुकाम हासिल किए हुए है, लेकिन जब आप पहाड़ की ओर आते हैं और खासकर उत्तराखंड पहुंचते हैं, तो यहां का सिनेमा जमीन पर कहीं नहीं दिखता.

वैसे तो अनाध‍िकारिक तौर पर उत्तराखंडी सिनेमा को ‘हिलीवुड’ कहा जाता है. कुछ इसे उत्तराखंडी सिनेमा कहकर भी पुकारते हैं, लेकिन यह स‍िनेमा सिर्फ यहीं तक स‍ीमित रह गया है. इसके प्रोत्साहन के लिए न सरकार के पास कोई ठोस नीति है और न ही निर्माताओं के पास पैसा. पहले यह इंडस्ट्री थोड़ी बहुत नरेंद्र सिंह नेगी और प्रीतम भरतवाण जैसे प्रसिद्ध लोकगायकों के गीतों पर टिकी थी, लेकिन अब इनके गीत भी बिकते नहीं, बल्क‍ि यूट्यूब पर मिलते हैं.

यही तो वजह है, जब लगभग 15 साल बाद नरेंद्र सिंह नेगी ने पहला गीत ‘होरी ऐगे’ गाया, तो उसे सीडी या कैसेट पर रिलीज करने की बजाय यूट्यूब पर जारी किया. कुछ लोग कहेंगे कि इसमें बुराई क्या है. वैसे तो बुराई कुछ नहीं, लेकिन यह हमारी उत्तराखंड फिल्म इंडस्ट्री की दुर्दशा दिखाता है. आज अगर नेगी दा को यूट्यूब पर अपना गाना रिलीज करना पड़ा, तो इसलिए क्योंकि अब कोई सीडी नहीं खरीदता.

गढ़वाली गीतों या फिल्मों का बड़े स्तर पर प्रदेश में फिल्मांकन नहीं होता. ये फिल्में बड़े-बड़े थियेटरों में नहीं लगती. क्योंकि ये सिनेमाघर बॉलीवुड की फिल्मों से पटी रहती हैं. यहां गढ़वाली फिल्में लगाने के लिए जगह नहीं होती. और होगी भी कहां से, क्योंक‍ि लोग देखने नहीं आते.

पिछले दिनों उत्तराखंड में दो तीन बड़ी फिल्में आईं. ल्या ठुंगार, सुबेरो घाम और गोपी बिना. तीनों फिल्मों में काफी ज्यादा पैसा खर्च किया गया था. खासकर गोपी बिना में. इसमें बॉलीवुड के फेमस अदाकार हेमंत पांडे्य और हिमानी श‍िवपुरी मुख्य भूमिका में थीं. लेक‍िन बड़े बजट और इतने बड़े सितारों से भरी हाोने के बावजूद भी इस फिल्म को सिनेमाघरों में लगने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ा. कहीं जगह मिली भी, तो दर्शकों को ढूंढ-ढूंढकर लाना पड़ा.

ऐसे में आप ही बताइए उत्तराखंड फिल्म इंडस्ट्री को संवारने के लिए कोई अच्छी फिल्म बनाना चाहता है, तो यह काम कैसे होगा. जब लोग ही अपनी भाषा की फिल्में नहीं देखना चाहते. जब राज्य सरकार को ही इससे फर्क नहीं पड़ रहा है कि हमारे क्षेत्रीय सिनेमा का बुरा हाल है. ऐसे में निर्माताओं के पास एक सामान्य सी स्टोरी और सामान्य से कलाकारों को लेकर फिल्म बनाना और उसे यू्ट्यूब पर अपलोड कर देने के अलावा क्या विकल्प रह जाता है.

किस चीज की जरूरत है?
– उत्तराखंड फिल्म इंडस्ट्री तब ही फल-फूल सकती है, जब निर्माताओं को प्रोत्साहन दिया जाएगा. सरकार की तरफ से इसके लिए जरूरी और उत्साहवर्धक नीति बनाई जाएगी.
– अच्छी कहानी वाली फिल्मों को कम से कम राज्य के सिनेमाघरों में अन‍िवार्यता जगह दी जाए. जैसे कि महाराष्ट्र में है. यहां हर मल्टीप्लेक्स में एक स्क्रीन पर मराठी फिल्म दिखाना जरूरी है.
– अच्छे कलाकारों को बढ़ावा दिया जाए. नरेंद्र सिंह नेगी और प्रीतम भरतवाण जैसे लोक कलाकारों के गीतों को खरीदने और बेचने की एक बेहतर व्यवस्था की जाए, ताकि ये न सिर्फ अच्छे गीत लिखने के लिए प्रेरित हों, बल्क‍ि बेहतर अभ‍िनय भी इनके गीतों के माध्यम से निखकर कर आए.
– और लोगों को अपने सिनेमा को बढ़ावा देने की खातिर अपनी बोली-भाषा सीखने के साथ ही इससे जुड़ी फिल्मों को देखने व दिखाने के साथ ही इस पर पैसो खर्च करने में हिचकना नहीं चाहिए. 300 रुपये में सलमान की फिल्म देखने के मुकाबले 60 रुपये में अपनी बोली-भाषा की फिल्म तो देखी ही जा सकती है न!

अगर यह सब नहीं हुआ, तो यूट्यूब पर ही हमारी फिल्म इंडस्ट्री दम तोड़ देगी और इसमें सिर्फ जिंदा रहेंगी, वह कानफोड़ू संगीत, जिसने नचाड़ गीतों के नाम पर हमारे शां‍त संगीत को बिगाड़ना शुरू कर दिया है.

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