नेपाली बस रहे पहाड़ों में, पहाड़ी बस रहे दिल्ली-मुंबई: सरकार

उत्तराखंड में हर मां-बाप अपने बच्चों को एक बात जरूर कहते हैं, ” गांव में क्या रखा है, कुछ नहीं है यहां.” यही सवाल उन नेपालियों से पूछना शुरू कीजिए, जो अब यहां बसने लगे हैं. जी हां. राज्य सरकार की तरफ से गठित पलायन आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. इसमें पलायन को लेकर कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं.

हम जा रहे हैं परदेश, नेपाली आ रहे हमारे घरदेश
रिपोर्ट के मुताबिक जहां यहां के रहिवाशी लगातार पलायन कर रहे हैं, वहीं नेपालियों की संख्या यहां धीरे-धीरे बढ़ने लगी है. वे लोग यहां न सिर्फ रोजगार कर रहे हैं, बल्क‍ि बंजर पड़े खेतों में सब्जी और धान उगाकर अच्छी कमाई भी कर रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर ऐसा ही रहा, तो पहाड़ को नेपाल बनने में देर नहीं लगेगी.

इन जिलों में है ज्यादा संख्या:
रिपोर्ट के मुताबिक पिथौरागढ़, चंपावत जैसे जिलों में कुछ समय से नेपाल से आए मजदूरों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ी है. ये लोग स्थायी रूप से यहां मजदूरी करने लगे हैं. ये लोग घर निर्माण, खेती-बाड़ी समेत अन्य तरीके अपनाकर यहां आजीविका का साधन खोज रहे हैं. पहाड़ के जिन स्कूलों में यहां के रहिवाश‍ियों के बच्चों को पढ़ना था, वहां नेपाली बच्चों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है.

30 विकासखंडों में सबसे ज्यादा पलायन:
राज्य की तकरीबन 7000 ग्राम पंचायतों में पलायन आयोग ने सर्वे करने के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है. 84 पन्नों की इस रिपोर्ट में सामने आया है कि राज्य के छह पहाड़ी जिलों के 30 विकासखंडों में सबसे ज्यादा पलायन हो रहा है.

लेक‍िन अच्छी खबर भी है
आयोग ने 6 महीने तक अध्ययन करने के बाद अपनी रिपोर्ट सौंपी है. हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक रिपोर्ट में जहां एक तरफ पलायन बढ़ने की बात कही गई है. वहीं, रिवर्स पलायन का जिक्र भी इसमें है. आयोग ने राज्य के 100 से ज्यादा लोगों का पता लगाया है, जो यहां रोजगार और पलायन को रोकने में अहम भूमिका निभा रहे हैं.

इनकी कोश‍िशें आ रही हैं काम
इन लोगों ने पहाड़ में आकर पर्यटन, फूड प्रोसेस‍िंग, उद्यान और खेती में सफल कारोबार खड़ा किया है. रिपोर्ट में नैनीताल जिले के बेतालघाट में कार्यरत ग्रामीण बीपीओ ‘बीटूआर’ का जिक्र किया गया है. यह बीपीओ यहां स्थानीय युवाओं को रोजगार देने के लिए लगातार प्रयासरत है.

900 से ज्यादा गांव भुतहा
पलायन आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि उत्तराखंड के 900 से भी ज्यादा गांव ऐसे हैं, जो अब भुतहा (जहां एक भी इंसान नहीं रहता) हो गए हैं. रिपोर्ट के अनुसार जहां आय का स्रोत कम है, वहां से ज्यादा पलायन हुआ है.

उत्तराखंड सरकार ने गत सितंबर में भारतीय वन सेवा से रिटायर्ड अधिकारी एसएस नेगी के नेतृत्व में उत्तराखंड पलायन आयोग का गठन कर पलायन की असल स्थिति जानने की दिशा में पहल की थी.

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