ये हैं अमेरिका की ‘नंदा देवी’, जिसने उत्तराखंड पर अपनी जान ही न्यौछावर कर दी

उसका जन्म वैसे तो अमेरिका के एक शहर में हुआ था, लेकिन उत्तराखंड से उसका खास लगाव था. यह लगाव उसके साथ उसके जन्म से ही जुड़ गया था.

जैसे-जैसे वो बड़ी होती गई, यह लगाव भी बढ़ता गया. और आख‍िर अपनी उम्र के 22वें पड़ाव पर वह उससे मिलने पहुंची, जिससे मिलने की ख्वाहिश उसने ताउम्र अपने मन में पाले रखी थी.

वो आई तो जरूर, लेक‍िन वाप‍िस नहीं गई. वह जिससे म‍िलने आई थी, उसकी ही बाहों में सिमटकर अदृश्य हो गई. वो थी अमेरिका की नंदा देवी अनसोइल्ड.

नंदा देवी अनसोइल्ड की कहानी शुरू होती है 1948 से. ये वही साल था, जब नंदा देवी के पिता विलियम अनसोइल्ड उत्तराखंड आए थे. इस दौरान उनकी नजर यहां के नंदा देवी पर्वत पर पड़ी थी.

एक इंटरव्यू में विलियम ने इस वाकिये को याद करते हुए कहा था, ” जब मैंने नंदा देवी पहाड़ को देखा, तो मैंने एक सपना देखा. मैंने सोचा कि अगर कल मेरी बेटी होती है, तो मैं उसका नाम नंदा देवी रखूंगा.”

और ऐसा ही हुआ. कुछ सालों बाद जब उनकी बेटी हुई, तो उन्होंने उसका नाम नंदा देवी रखा. वो सिर्फ नाम से नंदा देवी नहीं थी, बल्क‍ि उसका रोम-रोम नंदा देवी था. बचपन से ही उसके मन में नंदा देवी पर्वत से मिलने की इच्छा जाग चुकी थी.

नंदा देवी ने इस पर्वत पर चढ़ने की तैयारी पर कहा था, ”मैं नहीं जानती कि यह कैसे होगा. लेक‍िन पर्वत को लेकर मेरे मन में कुछ है. इस पर्वत से मेरा तब से कोई अटूट सा रिश्ता बना है, जब से मैं पैदा हुई हूं.”

नंदा देवी अपने पिता और अन्य पर्वतारोहियों की टीम के साथ जुलाई 1976 में नंदा देवी पर्वत से मिलने पहुंची. साथ में विलियम भी थे.

नंदा और विल‍ियम दोनो जानते थे कि नंदा देवी के लिए पर्वतारोहण करना जानलेवा साबित हो सकता है. नंदा को बचपन से ही पेट में तेज दर्द की श‍िकायत थी. पिता ने उसे समझाया भी, लेकिन वो तो मन में ठान चुकी थी.

22 साल की नंदा देवी ने अपने पिता और पर्वतारोहण के लिए आए अन्य साथ‍ियों के साथ पर्वतारोहण शुरू किया. 10 जुलाई को नंदा देवी समेत 13 पर्वतारोहियों ने पर्वतारोहण शुरू किया.

कुछ दिन पर्वतारोहण करने के बाद एक दिन अचानक नंदा देवी के पेट में तेज दर्द उठा. उसे डायरिया भी हो गया. टीम के साथ गए डॉक्टर ने नंदा को वापस जाने की हिदायत दी, लेकिन नंदा ने उसे अस्वीकार कर दिया.

नंदा देवी के आख‍िरी पल को उसके पिता विलियम ने बयां किया. उन्होंने बताया, ”8 सितंबर को उसने पेट में भयानक दर्द उठने की शिकायत की. उसने कहा कि वह मरने वाली है.” और उसने वहीं अपने प्राण छोड़ दिए.

विलियम ने अपनी बेटी को वहीं, पर्वत में बर्फ में दफना दिया. डॉक्टर के मुताबिक हद से ज्यादा ठंडी ने उसके पेट दर्द को बढ़ाने का काम किया. इसकी वजह से उसे प्लेग हुआ और वह मर गई.

नंदा देवी अनसोइल्ड की मौत पर तत्कालीन इंडियन माउंटेनीयरिंग फाउंडेशन के चेयरमैन ने एक पत्र लिखा. इसमें उन्होंने लिखा, ”क्या नंदा देवी पर्वत का उसके प्रति प्रेम बड़ा था या फिर उसका प्रेम पर्वत के लिए. इस बात का पता कभी नहीं चल पाएगा.”

अपनी बेटी के नंदा देवी पर्वत में समा जाने को लेकर विलियम अनसोइल्ड ने कहा, ”मुझे कोई पछतावा नहीं. हम सच्चाई से मुख नहीं मोड़ सकते. नंदा देवी अपने सपने को पूरा करते हुए मरी है. वरना मरने के तो और भी कई बुरे तरीके हैं. ”

नंदा देवी अनसोइल्ड ने बचपन से जो सपना देखा… उसे उसने आख‍िर पूरा किया. और वह आज भी उस पर्वत की गोद में सोई हुई है और उसके साथ एक हो चुकी है, जिसे वह हमेशा से मिलना चाहती थी.

नंदा देवी मां के नाम पर इस पर्वत का नामकरण हुआ है और इस पर्वत के नाम पर एक और नंदा देवी हमें मिली, जो उत्तराखंड या भारत में नहीं, बल्क‍ि अमेरिका में जन्मी थी. सिर्फ इसलिए ताकि वो एक दिन अपनी नामराश‍ि वाले पर्वत से मिल सके और उसकी गोद में आराम फरमा सके.

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