पप्पू कार्की: वो आवाज जो अब हमारे दिलों में अमर रहेगी…

‘पाना है मुकाम वो मुकाम अभी बाकी है, अभी तो जमीन पर आए हैं आसमान की उड़ान बाकी है’, पंचतत्व में विलीन होने से पहले पप्पू कार्की का फेसबुक स्टेटस था ये. उन्होंने उड़ान तो भरी थी, लेकिन उससे पहले ही नियति ने उनके पर कतर दिए. लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि उन्होंने आसमान नहीं पाया. कुमाऊंनी लोकगायन के लिए उन्होंने जो किया, आज के वक्त में शायद उतना किसी ने नहीं किया है.

शनिवार को पप्पू कार्की का निधन एक सड़क हादसे में हो गया. रविवार को उनका पार्थ‍िव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया. लेकिन उनकी आवाज बंद हुई है, मरी नहीं. कुमाऊंनी लोकगीतों को उन्होंने उत्तराखंड ही नहीं, बल्क‍ि देश-विदेश में भी पहचान दिलाई. गोपाल बाबू गोस्वामी, नरेंद्र सिंह नेगी, चंद्र सिंह राही और प्रीतम भरतवाण जैसे गढ़ लोकगायकों की फेहर‍िस्त में वो शामिल होते थे.

शनिवार को काठगोदाम से 32 किमी दूर हैड़ाखान मार्ग पर सुबह उनकी कार अन‍ियंत्र‍ित हो गई. इसके बाद कार 500 फुट नीचे गिर गई. हादसा इतना भयानक था कि कार के परखच्चे उड़ गए. इस हादसे में पप्पू कार्की समेत 3 लोगों की मौत हो गई. कार में सवार दो अन्य लोग घायल हो गए, जिनका फिलहाल इलाज चल रहा है. घायलों में एक और लोकगायक जुगल किशोर पंत हैं.

लोकगायन में किए प्रयोग
पप्पू कार्की को लोकगायन में नये-नये प्रयोग करने के लिए जाना जाता है. उन्होंने कुमाऊंनी लोकगायन को आधुनिकता की फूहड़ता में खत्म नहीं किया, बल्कि उसे ऐसे पिरोया कि उसका पहाड़ी रस खत्म न हो. उन्होंने नेपाली संगीत को भी उत्तराखंडी संगीत में मिलाकर प्रयोग किया. उन्होंने पारंपरिक गीतों को आधुनिकता का रंग देते हुए युवाओं के दिल तक पहुंचाया.

महज 5 साल की उम्र में शुरू किया गायन
पप्पू कार्की के रिश्ते के चाचा और उनके गुरु कृष्ण सिंह कार्की के मुताबिक पप्पू के मन में बचपन से ही संगीत के प्रति प्रेम जग गया था. महज 5 साल की उम्र से ही उन्होंने न्यौली गाना शुरू कर दिया था.

इन गानों ने पहुंचाया घर-घर
पप्पू कार्की को उनके गाने ‘डीडीहाट की जमना छोरी…’, ‘हीरा समधनी…’, ‘काजल क टिक लगा ले…’ और मधुली जैसी गानों ने घर-घर में पहचान दिलाई. उन्होंने कुमाऊंनी गीतों को गढ़वाली व अन्य भाषा बोलने वाले लोगों के लिए समझना आसान बनाया.

भले ही पप्पू कार्की हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज हमेशा हमारे कानों में गूंजती रहेगी. उनके शब्द हमारे दिल को शुकूंन पहुंचाते रहेंगे. पप्पू मरे नहीं हैं, अमर हुए हैं.

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