दावा: उत्तराखंड नेपाल का है, जानें क्या है सच

पिछले दिनों पलायन आयोग की रिपोर्ट आने के बाद हमने एक वीडियो बनाया था. इस वीडियो में हमने आयोग के हवाले से कहा था कि किस तरह उत्तराखंड में नेपाली लोग गुजर बसर कर रहे हैं और उत्तराखंडी यहां से परदेश की ओर पलायन कर रहे हैं. ये वीडियो किसी का अपमान करने के लिए नहीं, बल्क‍ि उत्तराखंडियों को ये बताने के लिए था कि अगर नेपाली मूल के लोग पहाड़ों गुजर बसर कर सकते हैं, तो हम क्यों नहीं.

खैर, ये तो वो बात है, जो हमने कहनी चाही. लेक‍िन इस वीडियो के बहाने एक बहस शुरू हो गई. हमारे कई नेपाली दोस्तों ने दावा किया कि उत्तराखंड , नेपाल का हिस्सा है. वह कभी एक मुख्तलिफ क्षेत्र था ही नहीं… इस पर काफी ज्यादा बहस बाजी हुई, तो हमने इतिहास के पन्नों को खंगाल कर इस दावे की सच्चाई को सामने लाने की कोश‍िश यहां की है.

पुराण क्या कहते हैं?
शुरुआत उत्तराखंड से करते हैं. डॉ. राकेश मोहन अपनी किताब ‘पौराण‍िक उत्तराखंड’ में इस राज्य का पौराण‍िक इतिहास बयां करते हैं. किताब के मुताबिक पहले उत्तराखंड को पहले केदारखंड कहा जाता था. सिर्फ इस किताब में ही नहीं, बल्कि वेदों और महाभारत में भी इस धरती का जिक्र आता है. आज भी यहां पांडवों के होने के निशान मिलते हैं. यही नहीं, पौराण‍िक कथाओं में भी पांडवों के यहीं से स्वर्ग जाने का वर्णन मिलता है. इससे एक बात तो साबित होती है कि बाद में उत्तराखंड राज्य बनने वाला केदारखंड हजारों सालों से मौजूद है.

नेपाल के बारे में क्या कहते हैं पुराण?
अब बात करते हैं नेपाल की. ‘हिस्ट्री ऑफ नेपाल: विथ एन इंट्रोडक्टरी स्केच ऑफ द कंट्री एंड पीपल ऑफ नेपाल’ किताब में इस देश की स्थापना का जिक्र मिलता है. किताब के मुताबिक नेपाल की स्थापना ‘ने’ नाम के मुनी ने की थी. बाद में उन्हीं के नाम पर इसका नाम नेपाल रखा गया था. ऐसा माना जाता है कि ने मुनी उन ऋष‍ियों में से एक थे, जिन्होंने तीन वेद लिखे थे.

स्कंदपुराण में भी ने ऋष‍ि का जिक्र मिलता है. इसके मुताबिक नेमुनि हिमालय में रहते थे. वहीं, पशुपति पुराण में भी उन्हें संत और सुरक्षा करने वाला बताया गया है. माना जाता है कि नेमुनि गोपाल राजवंश के दौरान रहे थे. इस राजवंश ने 621 साल राज किया था.

पुराणों से क्या पता चलता है?
अगर आप पुराणों के हवाले से कहेंगे तो पहले एक केदारखंड था. जिसमें पूरे हिमालय का क्षेत्र आता था. इसमें आज का उत्तराखंड और नेपाल भी शामिल था. बाद में नेमुनि ने नेपाल की स्थापना की.

इतिहास क्या कहता है?
नेपाल के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर नेपाल का इतिहास दिया गया है. इसके मुताबिक गोपाल और महिपाल राजवंश इस देश पर राज करने वाले शुरुआती राजवंश थे. उसके बाद 7वीं से 8वीं शताब्दी में किरांती राजवंश ने यहां राज किया. इनके राजा किंग यलुंबर का जिक्र भी महाभारत में मिलता है. आगे इसमें बताया गया है कि 300 ईसा पश्चात उत्तरी भारत से लिच्छवी राजा यहां आया और उसने किरांती को उखाड़ फेंका.

वहीं, उत्तराखंड की बात करें तो यह इस दौर में भी केदारखंड के नाम से जाना जाता था. The Imperial Gazetteer of India 1909 और ऐसी ही अन्य किताबों में इसका जिक्र मिलता है. इतिहास के मुताबिक 2 ईसा पूर्व (BC) यहां कुनिंदा किंगडम का राज था. इस भाग में क्षत्र‍िय रहते थे.

एक था पश्च‍िमी नेपाल और उत्तराखंड
4वीं सदी ईसा पश्चात के बाद से मौजूद कई दस्तावेजों में जिक्र‍ है कि पश्च‍िमी नेपाल और उत्तराखंड सदियों तक एक ही साम्राज्य था. जिस पर कत्यूरी राजाओं का राज था. यही वजह है कि उत्तराखंड और नेपाल के बीच परंपराओं से लेकर अन्य कई चीजों की समानता है. कत्यूरी महारानी जिया रानी का वर्णन उत्तराखंड में और दोती (जो अब नेपाल का हिस्सा है) में मिलता है.

राहुल सांकृत्यायन अपनी क‍िताब में लिखते हैं कि कुमाऊं और गढ़वाल के राजा ‘केदार खसमंडले’ के नाम से जाने जाते थे. इसका मतलब हुआ कि केदार क्षेत्र खस जाति का निवास स्थान है.

क्या इस आधार पर है नेपालियों का दावा?
आप 17वीं सदी की तरफ आते हैं, तो ये दौर था जब भारत पर अंग्रेजों का राज था. इस दौरान उत्तराखंड दो हिस्सों में बंटा हुआ था. एक था कुमाऊं और दूसरा गढ़वाल. कुमाऊं और गढ़वाल के बीच बनती नहीं थी. दोनों के अलग-अलग राजा थे. सन 1790 में नेपाल के गोरखा राजा की तरफ से कुमाऊं पर हमला करने का जिक्र मिलता है. इसके बाद 1803 में गोरखा राज ने गढ़वाल मंडल पर भी हमला किया और इन्हें जीत कर हथिया लिया. बाद में इस हिस्से को मिलाकर ही ‘द ग्रेट नेपाल’ का नाम दिया गया. उत्तराखंड के इतिहास में गोरखा राज को काले अक्षरों में दर्ज किया गया है.

सुगौली संधि‍
इसके बाद 1815 में अंग्रेजों ने नेपाल के राजा और कुमाऊं व गढ़वाल के राजाओं के बीच ‘सुगौली संध‍ि’ करवाई. इस संध‍ि में जहां कुमाऊं और गढ़वाल मंडल का हिस्सा लौटा दिया गया. वहीं, कुछ अन्य राज्यों की जमीन भी गोरखा राजा को वापस देनी पड़ी.

तो क्या सच  में उत्तराखंड नेपाल का है?
अगर हम पुराणों की बात करें, तो ये साबित होता है कि नेपाल का अस्त‍ित्व बाद में आय. पहले एक क्षेत्र था.. केदारखंड. जिसमें पूरा हिमालय आता था. दूसरी बात, जहां नेपाल के विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक नेपाल के शुरुआती राजा ईसा पश्चात हुए थे. जबकि केदारखंड के राजा ईसा पूर्व से ही यहां राज कर रहे थे.

इन दोनों तथ्यों से ये साफ होता है कि उत्तराखंड कभी नेपाल का हिस्सा था ही नहीं. बल्कि जिस केदारखंड को आज उत्तराखंड कहा जाता है. संभवत: नेपाल उसी में से निकलकर बना है. दूसरी तरफ, कत्यूरी राजवंश में इसके केदारखंड का हिस्सा होने का जिक्र भी मिलता है.

और अगर हम ये कहते हैं कि 18वीं सदी में गोरखा राजा ने कुमाऊं और गढ़वाल को अपने में मिला लिया था, तो वो भी गलत होगा. क्योंकि सुगौली संध‍ि में ये साफ लिखा गया है कि गोरखा के राजा गढ़वाल और कुमाऊं की जागीर इन्हें वापस लौटाएंगे. ये कहीं नहीं लिखा है क‍ि अपना हिस्सा देंगे.

इस तरह ये कहना कि उत्तराखंड नेपाल का हिस्सा था… पूरी तरह गलत होगा. हालांकि अच्छी बात यह है कि उत्तराखंड और नेपाल, दोनों एक दूसरे के समकक्ष हैं. दोनों के बीच रोटी-बेटी का रिश्ता है. और ये इसलिए है कि क्योंकि हम एक ही जननी के दो बेटे हैं.

इसलिए नेपाल और उत्तराखंड में कोई फर्क न करें. दोनों के बीच नफरत पैदा करने की बजाय सद्भाव और भाईचारे को बढ़ावा दें.

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