उत्तराखंड के तीन दुश्मन, बादल, पलायन और ये देश

उत्तराखंड को प्रकृति ने खुद अपने हाथ से संवारा है… खूबसूरती ऐसी कि बेचैन मन भी यहां सुकून पाता है. जंगलों से घ‍िरा हुआ, पहाड़ों की गोद में बसा हुआ और शुद्ध पानी व शुद्ध खाने का स्रोत है उत्तराखंड. देवभूमि के इस रूप को जब हम देखते हैं, तो लगता है कि जमीन पर स्वर्ग उतर आया है, लेकिन इस स्वर्ग के भी कुछ दुश्मन हैं. जो इसे गाहे-बगाहे परेशान करते रहते हैं, तोड़ने की कोश‍िश में जुटे रहते हैं… लेक‍िन ये है कि अपने शीष हिमालय की तरह तन कर और ढंट कर आज भी खड़ा है.

बादल अथवा आपदा
उत्तरकाशी में बादल फट गए. रुद्रप्रयाग में बाढ़ आ गई. चमोली में बिजली गिरने से दो लोगों की मौत हो गई. भूस्खलन होने से उत्तराखंड में कई घर और लोग मलबे में दब गए… ये कुछ ऐसी खबरे हैं, जो आए दिन समाचार चैनलों पर सुनने व देखने को मिलती हैं. गर्मी का मौसम हो या बरसात हो… यहां बादल फटना और आपदा आना कोई नई बात नहीं है.aapadha

वर्ष 2013 के 16 व 17 जून को केदारनाथ आपदा आई. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस हिमालयी सुनामी में करीब साढ़े पांच हजार लोग मारे गए. 11,759 भवनों को आंशिक क्षति पहुंची. इसके अलावा 11,091 मवेश‍ियों की जान गई और 1308 हेक्टेयर कृषि भूमि को भी आपदा ने बरबाद कर दिया.

उत्तराखंड व प्राकृतिक आपदाएं एक-दूसरे से सैकड़ों साल से जुड़ी हुई हैं. भूस्खलन, बादल फटना, आसमानी बिजली गिरना, बाढ़, भूकंप की घटनाएं पहाड़ों में निरंतर देखने को मि‍लती हैं. इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो 1803 में गढ़वाल अर्थक्वेक का नाम सामने आता है. इस भूकंप ने उत्तर भारत में तबाही मचाई थी. ऐसा कहा जाता है कि इसी का फायदा उठाकर गोरखाओं ने गढ़वाल पर आक्रमण किया और इसे अपने कब्जे में ले लिया.

इसके अलावा उत्तराखंड में आई प्रमुख आपदाओं में वर्ष 1868 में बिरही की बाढ़, 1880 में नैनीताल के पास भू-स्खलन, 1893 में बिरही में बनी झील, 1951 में सतपुली में नयार नदी की बाढ़, 1979 में रुद्रप्रयाग के कौंथा में बादल फटने की घटना शामिल है. वर्ष 1991 में उत्तरकाशी में भूकंप, 1998 में रूद्रप्रयाग व मालपा में भू-स्खलन, 1999 में चमोली व रूद्रप्रयाग में भूकंप, 2010 में बागेश्वर के सुमगढ़ में भू-स्खलन समेत अन्य शामिल हैं. इन भूकंप और बादल फटने की घटनाओं में हजारों लोगों की जानें गईं.

पलायन :
ये एक ऐसा दुश्मन है, जिसे प्रकृति और हमारी सरकार की नाकामयाबी ने खड़ा किया है. सन 2000 में जब उत्तराखंड राज्य बना था, तो उसके पीछे सोच यही थी कि पहाड़ की समस्याओं का समाधान कर इसे खुशहाल बनाया जाएगा, ले‍क‍िन 17 साल गुजरने के बाद भी हालात नहीं बदले. बल्क‍ि पलायन बढ़ गया है.Migration-from-Uttarakhand-Hills

हाल ही में आई पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक उत्तराखंड के तकरीबन 1000 ऐसे गांव हैं, जहां अब एक भी इंसान नहीं रहता. और उत्तराखंड में पलायन लगातार बढ़ता जा रहा है. इस दुश्मन से लड़ने के लिए हम सबको प्रयास करना होगा.

चीन:
तीसरा जो दुश्मन है, वो सिर्फ उत्तराखंड का ही नहीं, बल्क‍ि देश के लिए भी हानिकारक है. आए दिन चीन के सैनिकों की तरफ से उत्तराखंड की सीमाओं में घुसपैठ करने की खबरें सामने आती रहती हैं. चमौली की चीन से लगी सीमाओं पर चीन के भारतीय सीमा में आने की घटनाएं सामने आती रहती हैं. कभी उनके विमान हमारी सीमा में पहुंच जाते हैं. चीन को जवाब देने के लिए वैसे तो हमारी भारतीय सेना तैनात है, लेक‍िन इन सभी घटनाओं का यहां के जनजीवन पर असर पड़ता है. सीमांत गांवों के मन में भारत-चीन के बीच टकराव का डर हमेशा बना रहता है.
China-PLA-sings-Jai-Ho-as-India-goes-for-Border-Defence
तो ये थे उत्तराखंड के तीन दुश्मन, लेकिन अच्छी बात ये है कि इन्होंने देवभूमि पर जितने भी वार आजतक किए हों, उनके बावजूद हमारा उत्तराखंड ढंट कर खड़ा है और लोहा ले रहा है और आगे भी लेता रहेगा.

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