उत्तराखंडी संगीत को हमसे ज्यादा जानता है ये अंग्रेज

आप ने लोकगायक प्रीतम भरतवाण के साथ एक अंग्रेज की तस्वीर अक्सर देखी होगी. प्रीतम के नारंगा सारंगा एलबम के जागर में भी आपको ये अंग्रेज दिखा होगा. दमो बजाते हुए. इस अंग्रेज के एकाध ऐसे वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, जहां ये नेगी दा के गीत को गुनगना रहा है.

लेक‍िन क्या आप जानते हैं ये शख्स ढोल-दमो के बारे में हमसे ज्यादा जानता है. जी हां. और ये कोई आम अंग्रेज नहीं है. इसमें समूचा उत्तराखंड और यहां का पूरा पारंपरिक संगीत बसता है.

नाम है स्टीफन फियोल, लेकिन उत्तराखंड आकर ये फ्योंली दास बन गए. इनका जन्म वैसे तो 80 के दशक में हुआ है, लेक‍िन उत्तराखंड से इनका नाता 88 साल पहले ही जुड़ गया था. जब 1930 में इनके दादा जी यहां आए थे.

कौन हैं स्टीफन फियोल?
स्टीफन फ‍ियोल अमेरिका के एक जाने-माने प्रोफेसर हैं. वे सिनसिनैटी शहर के रहने वाले हैं. कुछ साल पहले तक वह यहीं स्थ‍ित सिनस‍िनैटी यूनिवर्सिटी में संगीत के प्रोफेसर थे. इन्होंने करीब 14 साल तक उत्तराखंड के पारंपर‍िक वाद्य यंत्र ढोल-दमो और यहां के पारंपर‍िक संगीत को सीखा, समझा और अपनाया.

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14 साल तक अध्ययन करने के बाद इन्होंने 2017 में ‘Recasting folk in the himalayas’ नाम की किताब ल‍िखी है. इस किताब में उन्होंने उत्तराखंड के पारंपर‍िक संगीत और ढोल-दमो का विस्तार से अध्ययन किया है. इस किताब को आप ऑनलाइन आसानी से खरीद सकते हैं.

उत्तराखंड में फियोल का सफर
फियोल साल 2003 में उत्तराखंड पहुंचे. वह यहां उत्तराखंडी संगीत को समझना और सीखना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने देवप्रयाग स्थित नक्षत्र वेधशाला शोध केंद्र में योगाचार्य भास्कर जोशी से ढोल सागर के इतिहास व बारीकियों को समझा. इसके साथ ही इस परंपरा के सिद्धहस्त लोकवादकों की जानकारी भी जमा की.

उन्होंने इस सिलसिले में देवप्रयाग ब्लॉक के पुजार गांव में लोकवादक सोहन लाल से ढोल-दमाऊं की ताल, वार्ता व जागरों को भी सीखा. इसके लिए वह उनके साथ यहीं रहे. उन्हें उत्तराखंड और यहां की संस्कृति इतनी पसंद आई कि वह यहां के ही होकर रह गए और अपना नाम भी फ्योंली दास रख दिया. उन्होंने न सिर्फ हिंदी सीखी, बल्क‍ि वह अच्छी गढ़वाली भी बोल लेते हैं.

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अमेरिक‍ियों को भी सिखाया ढोल-दमो:
वो स्टीफन फियोल ही थे, जो लोकगायक प्रीतम भरतवाण को अमेरिका लेकर गए. 2012 में तकरीबन एक महीने तक प्रीतम भरतवाण ने छात्रों को ढोल-दमो बजाना सिखाया. इसके बाद स्टीफन और प्रीतम भरतवाण ने सिनसिनैटी यूनिवर्स‍िटी के छात्रों के साथ मिलकर यहां की कई यूनिवर्स‍िटीज में इस कला का प्रदर्शन भी किया. स्टीफन इस साल फरवरी में भी एक बार फिर प्रीतम को अमेरिका लेकर गए. यहां प्रीतम भरतवाण ने अपने जागरों का जादू बिखेरा.

स्टीफन फियोल ढोल-दमो पर एक किताब लिख चुके हैं, जो एक ढोल-दमों की विधा को सहेजने वाला ऐतिहासिक दस्तावेज से कम नहीं है. अब वह एक और किताब ‘ Dialects of Dhol: Mapping Rhythm, Memory and History in the Central Himalayas’ लिख रहे हैं. इसमें वह ढोल-विधा पर और करीब से प्रकाश डालेंगे. और उनकी एक शॉर्ट फिल्म भी इस संबंध में जल्द आने वाली है.

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स्टीफन ने न सिर्फ दासों से संगीत सीखा है, बल्क‍ि उनकी दयनीय स्थ‍िति सुधारने की खातिर भी उन्होंने काम किया है. इसके लिए उन्होंने प्रीतम भरताण और नरेंद्र सिंह नेगी के साथ मिलकर कई कार्यक्रम भी आयोजित किए.

ढोल-दमो के बारे में क्या कहते हैं स्टीफन:
जागरों में देवताओं को बुलाने के लिए बजाई जाने वाली धुन्याल को स्टीफन ने बड़े ही रोचक तरीके से पेश किया है. उनके मुताबिक ढोल-दमो टेलीफोन की तरह हैं. औजी अथवा दास इनका इस्तेमाल देवताओं को बुलाने के लिए करते हैं. स्टीफन आगे कहते हैं, ”मैं ढोल दमों और यहां के संगीत के जरिये इस क्षेत्र को समझने की कोश‍िश कर रहा हूं.”

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 आज भी उत्तराखंड से जुड़े हैें स्टीफन
स्टीफन आज भी मन से उत्तराखंड में हैं और वह आज भी हमारे पारंपरिक ढोल-दमो वाद्य यंत्रों को बचाने और इनके संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध हैं. हम उत्तराखंड के लोग (अगर औजियों को छोड़ दिया जाए तो) उत्तराखंड संगीत और ढोल-दमो के बारे में ना के बराबर जानते हैं. लेक‍िन स्टीफन इस संगीत को न सिर्फ जानते हैं, बल्क‍ि वह इसे जीते हैं.

आज अगर देश और दुनिया में उत्तराखंडी संगीत व ढोल-दमो सुनाई देते हैं, तो उसका कुछ हद तक श्रेय स्टीफन फ‍ियोल को भी जाता है. हमें उम्मीद है कि हम भी स्टीफन से कुद सीखेंगे और भेद-भाव छोड़कर औजियों का सम्मान और सत्कार करेंगे.

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