हिल जात्रा: ये पि‍थोरागढ़ को मिली नेपाल की सौगात है

नेपाल और उत्तराखंड की सीमा ही नहीं, बल्क‍ि यहां के लोगों के दिल भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं. नेपाल भले ही एक अलग देश हो, लेकिन आज भी एक छोटा नेपाल उत्तराखंड में बसता है. पिथौरागढ़ जिले में हर साल ये छोटा नेपाल देखने को मिलता है.

हर साल मनाया जाता है उत्सव
पिथौरागढ़ में एक ऐसा त्यौहार मनाया जाता है, जो यहां के अलावा राज्य में कहीं और नहीं आयोजित होता. इसे ‘हिल जात्रा’ कहा जाता है. यह हर भादो माह में मनाया जाता है. इसमें मुखौटा नृत्य होता है.

हिल का शाब्द‍िक अर्थ है दलदल. यानी कीचड़ अथवा पानी से भरी दलदली भूमी. जात्रा का अर्थ खेल अथवा यात्रा होता है. इस तरह यह रोपाई के समय आयोजित किया जाता है. सोरघाटी के कुमौड़ और बजेटी गांव में इसका आयोजन होता है. जिले के भुरमुनी, बलकोट, मेल्टा, खतीगांव, लोहाकोट समेत अन्य कई गांवों में भी यह त्यौहार हर साल मनाया जाता है.

आयोजन में क्या है खास?
हिल जात्रा की शुरुआत ढोल-दमो की थाप से होती है. कुछ लोग बैलों का मुखौटा पहनकर इसका मंचन करते हैं. सब लोग दो-दो बैलों की जोड़‍ियों में होते हैं. जोडि़यों को हांकने के लिए हल‍िया भी होता है. ये जोड़‍ियां मैदान में घूम-घूम कर नृत्य करती हैं.

इसमें मुख्य रूप से दो बैल होते हैं. वहीं, कुछ बैल अकेले भी होते हैं. एक मरकव्वा बल्द होता है, जो सबको मारता फिरता है. यह सबसे तेज दौड़ता है. दूसरा, गल्या बल्द होता है. यह कामचोर बैल होता है. इस बैल के जरिये हास्य का प्रदर्शन किया जाता है.

ये बैल बार-बार सो जाता है. उसका हलिया उसे हांकते-हांकते परेशान हो जाता है. ये दोनों ही बल्द रोपाई के दौरान लोगों के सामने पेश होने वाली मुश्क‍िलों को हास्य रूप में पेश करते हैं.

हिल जात्रा का मुख्य आकर्षण हिरन और लख‍िया भूत होता है. चार लोग हिरन की मुद्रा धारण करते हैं. लख‍िया भूत भी इसमें शामिल होता है. अंत में हिरन पर देवता अवतरित होते हैं. इसके साथ ही हिल जात्रा का मंचन य हीं खत्म होता है.

नेपाल से क्या है कनेक्शन?
दरअसल हिल जात्रा की ये परंपरा नेपाल से ही उत्तराखंड पहुंची है. 15वीं शताब्दी में चांद राजा के महर बंधु नेपाल के ‘इंद्र जल’ उत्सव में शामिल होने पहुंचे थे.

महर बंधुओं ने इस उत्सव में जीत हासिल की. यह देखते हुए नेपाल के तत्कालीन राजा ने उन्हें उत्सव में इस्तेमाल किए गए मुखौटे भेंट किए.

लोककथाओं के मुताबिक महर बंधुओं ने चसर, जखनी और कुमर गांव की स्थापना की. उन्होंने यहां इंद्र जल उत्सव मनाना शुरू किया. तब से यह परंपरा निरंतर यहां जारी है.

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