लोक कथा: बूसे की रोटी खाएगा… झाड़ू की मार सहेगा… हां दीदी हां

किसी गांव में एक किसान परिवार रहता था. उसका एक बेटा और एक बेटी थी. उसकी पत्नी की मृत्यु हो गयी. दोनों बच्चों का पालन-पोषण वह स्वयं करने लगा. वह हमेशा चिंतित रहता था. बेटी बड़ी थी, उसकी चिंता उसे अधिक रहती थी. वह सोचता था कि बेटी के हाथ जल्दी पीले हो जाएं और वह ससुराल चली जाए.

एक दिन वह शुभ घड़ी आ गयी. किसान ने बेटी का विवाह अपनी हैसियत के अनुसार तय किया और उसे ससुराल विदा कर दिया. अब किसान घर पर अकेला पड़ गया. बेटा छोटा था. उसकी परवरिश और पहाड़ की खेती करना दोनों मुश्किल. इस बीच किसान की मृत्यु हो गई.

किसान का बेटा अनाथ हो गया. बेटी का घर भी गरीब परिवा था. फिर भी बेटी अपने भाई को अपनी ससुराल ले जाने की सोचने लगी. उसने सास-ससुर और अपने पति से इस संबंध में पूछा. उसके ससुराल में संपन्नता होती तो निश्चित रूप से वे लोग अपनी बहू की बात उसी समय मान लेते और मित्र धर्म का भी पालन कर लेते. परन्तु ऐसा कहना संभव नहीं था.

बहू की बात मानने से पहले समाज के भय से उन्होंने तीन शर्तें रखी. उनकी पहली शर्त थी-“सामान्य भोजन की बजाय उसे भूसे की रोटी और बिच्छू बूटी का साग खाने को मिलेगा.

दूसरी शर्त रखी कि वह बिस्तर पर नहीं, उसे चक्की की ओट में टाट-बोरी के चिथड़ों पर सोना पड़ेगा.

तीसरी शर्त- वह दिन भर मवेशियों को जंगल ले जाएगा. उनकी अच्छी देखरेख करेगा. किसी भी तरह का नुकसान होने पर दंड के रूप में उसे झाड़ू की मार पड़ेगी.”

बहन फूट-फूट कर रो पड़ी. वह नहीं समझ पार रही थी कि सास-ससुर को कैसे समझाए कि ये शर्तें उसके भाई के लिए कष्टदायी होंगी. जब उसे कोई रास्ता नहीं दिखा तो हृदय पर पत्थर रखकर उसने भाई को शर्तें बता दी.

भाई बोला, “संसार में जिसका कोई न हो, उसे जीवित रहने के लिए भूसे की रोटी और रहने के लिए जगह मिल जाए तो बहुत है.”

बहन को लगा, उसका भाई अब इतना छोटा और नासमझ नहीं है. परिस्थितियों ने उसे भला-बुरा सोचना सिखा दिया है. वह बहुत खुश हुई. तुरंत अपने सास-ससुर के पास गयी और उन्हें बता दिया कि उसे और उसके भाई को वो तीनों शर्तें मंजूर हैं.

भाई अपनी बहन के ससुसार में रहने लगा. छोटे-छोटे कार्यों से दिन की शुरुआत होने लगी. उसकी कार्यों के प्रति निष्ठा को देखते हुए उसे मवेशियों को चरवाने की जिम्मेदारी दे दी गयी. उसे भी मवेशियों को लेकर जंगल जाना अच्छा लगने लगा.

एक दिन सास-ससुर को संदेह हुआ. उन्हें लगा उनकी बहू चोरी-चोरी भाई को अपने हिस्से का खाना तो नहीं परोसती! उस पर निगाह रखी जाने लगी. वे लोग घर में अच्छा खाना बनाते-खाते और उसके भाई को भूसे की रोटी, बिच्छू बूटी का साग परोस देते. और चक्की की ओट, टाट-पट्टी पर वह दिन का थका हारा गहरी नींद सो जाता. एक दिन मवेशियों को लेकर वह जंगल को जा रहा था- उसे रास्ते में एक अपरिचित व्यक्ति मिला. उस व्यक्ति ने उससे अपने साथ चलने को कहा.

वह बड़े असमंजस में घिर गया. अब वह इतना छोटा नहीं रह गया था कि बहन के ससुराल पर बोझ बनकर रहे. अनजान व्यक्ति को उसने सहमति नहीं दी. किंतु जब उस अनजान व्यक्ति ने उसे उज्ज्वल भविष्य के सपने दिखाए तो वह तैयार हो गया.

मन ही मन में स्वयं को समझाया- इस जंगल में बाघ के पंजो के बीच तड़पने की बजाय इस अनजान व्यक्ति के साथ जाने में समझदारी है. उसने तुरंत निर्णय लिया और उस व्यक्ति के साथ चल पड़ा.

सांझ ढलने लगी. भाई जब मवेशियों को लेकर नहीं लौटा तो बहन के होश उड़ गये. गांव भर के साथ गये मवेशी चरानेवालों से पूछताछ होने लगी. जंगल छान मारा गया लेकिन उसका कोई पता नहीं लगा.

उसे किसी ने कहीं जाते हुए देखा होता तो कुछ पता लगता. निराश होकर बहन फूट-फूटकर रोने पड़ी. उसके सास-ससुर भी गैर जिम्मेदार भाई बताकर उसी को कोसने लगे.

दिन-महीने निकलते गये. गांव की बहू-बेटियां अपने भाई-बहन से मिलने आती-जातीं. बार-त्यौहार पर उसे भाई की याद आती. भाई के लौटने की आशा उसकी कम होती गयी. बाकी दिनों में उसने भाई को भुला दिया या उसे भूल जाने का उपक्रम करती रही.

अचानक उसे एक दिन संदेश मिला. जिस भाई को वह मरा मान चुकी थी, वह संदेश उसी का था. वह भाई से मिलने अपने मायके गई. जहां उसका अपना सगा कोई न था. जिस घर का रास्ता तक वह भूल चुकी थी. उसने जब आने-जानेवालों से अपने भाई के घर का रास्ता पूछा, तो भाई की संपन्नता से उसका रास्ता दिखाने में किसी को मुश्किल नहीं आई.

भाई के घर-परिवार और संपन्नता देख उसे स्वयं की आंखों पर विश्वास नही आया. भाई ने उसे अपनी आपबीती सुनाई तो खुशी से उसके आंसू छलछला आए. बहन ने भी किसी तरह अपने कलेजे पर पत्थर रखा, उसने भी कह सुनाया.

भाई ने अपना प्यार और रुपया पैसा उस पर उड़ेल देना चाहा. परन्तु बहन को भाई की धन-दौलत सब कुछ तुच्छ प्रतीत हुई. उसे लगा उसकी सबसे बड़ी दौलत उसका बिछड़ा भाई लौट आया. इससे बड़ी उसकी खुशी उसके लिए दूसरी नहीं हो सकती. अब उस खुशी से छोटी दौलत की उसे जरूरत नहीं थी.

जब भाई ने उसे एक भैंस और दो गायें देनी चाही तो उसने उसे लेने से इन्कार नहीं किया. भाई से उसने कहा, “मेरे बच्चों को दूध की जरूरत है भाई! उसके बगैर वे सूखकर कांटा हो चुके हैं मेरी तरह. जब मेरे बदन का पानी ही सूख गया तो मैं उन्हें दूध पिलाऊं भी कहां से.”

भाई बहुत खुश हुआ. आखिर बहन ने उससे एक सौगात तो स्वीकार कर ली. उसने गाय के गले में एक घंटी बांध दी और उसे बहने के घर का रास्ता दिखा दिया.

आगे-आगे बहन जा रही थी, उसके पीछे-पीछे एक भैंस और दो गाय. और उनके बीच फैली खमोशी को भंग करती घंटी की मधुर आवाज. जिसे सुनकर बहन को लगा- घंटी का हर स्वर पूछ रहा हो-

”भूसे की रोटी खाएगा-हां दीदी

चक्की की ओट में सोएगा- हां दीदी

और झाड़ू की मार सहेगा- हां दीदी”

यह सुनकर वह अपने को काबू में नहीं रख सकी. वह जोर-जोर से खिलखिला उठी, गोया घंटी का शोर भी ऐसा ही कुछ कह रहा हो.

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