उत्तराखंडी लोक कथा: कलुआ कूबचनी

किसी गांव में कलुआ नाम का एक आदमी रहता था. वह कोई काम-धाम नहीं करता था. निकम्मा घूमता रहता. लोग उसे नापसंद करते थे. जब वह गांव के लोगों के सुख-दुख में साथ नहीं देता था, तो लोग उसे अपने बीच उठने-बैठने योग्य भी नहीं समझते थे.

कलुआ लोगों के व्यवहार से परिचित था. उसे इस व्यवहार पर न दुख होता न अफसोस बल्कि उसे आनन्द आता था. बिना काम-धाम के उसे अच्छा से अच्छा खाना-पीना मिल जाता. कोई उसे कहीं भी जाने-आने से रोकता-टोकता भी नहीं था.

गांव में जब शादी-ब्याह या फिर कोई भी शुभ कार्य होता तो वह बिना बुलाए मेहमान बनकर वहां जा धमकता. ज्यों ही वह लोगो के बीच पहुंचता. सबके चेहरे फीके पड़ जाते. शुभ कार्य करने की खुशी फुर्र हो जाती. कलुआ का पहुंचना उतना भय पैदा नहीं करता जितना कि उसकी जबान से क्या निकल जाए.

उसकी हर बात अपशकुन मानी जाती. वह कुछ ऐसा कह देता कि लोगों में दहशत पैदा हो जाती थी. कलुआ को देखते ही गांव के समझदार लोगों में खुसर-फुसर शुरू हो जाती और उनकी कोशिश रहती कि बिन बुलाए मेहमान कलुआ की खुशामद में किसी तरह की कमी न रह जाए. वे सभी तरह के पकवान उसे खिलाते और पूरे सम्मान के साथ विदा करने लगते.

अपनी सेवा में जुटे लोगों को देखकर कलुआ अधिक प्रसन्न हो जाता और ज्यों ही आयोजन की प्रशंसा करने लगता लोगों का कलेजा कंठ पर आ जाता. पता नहीं कलुआ अब  आगे क्या कहने वाला है? और कलुआ था कि कहे बिना रह नहीं सकता था.

एक दिन की बात है, गांव का प्रधान एक गाय खरीद कर ला रहा था. रास्ते में उसे अचानक कलुआ मिल गया. प्रधान की पांव तले जमीन खिसकने लगी. मन ही मन प्रधान ने उसे कोसा पर उसके कोसने से क्या होने वाला था.

कलुआ प्रधान की गाय की तारीफ करते हुए बोला, “प्रधान जी, गाय कहां से खरीद कर लाए हैं? अच्छी नस्ल की है. कितना रुपया लगाकर ले आए. इतनी सुन्दर गाय के लिए जितना भी दाम दिया होगा वह कम ही है. एक बात कहूं प्रधान जी! आपने एक बात गलत कर दी…”

“वह क्या कलुआ” प्रधान के मुंह से निकला.

“गाय तो बहुत बड़ी है. मगर जिस रास्ते पर उसे ले जा रहे हैं वह तंग है. यदि इतनी बड़ी गाय चिड़िया को देखकर बिदक गयी और उसका पांव फिसल गया, तो वह नीचे खाई में गिर जाएगी. ऐसे में गाय के प्राण पखेरू उड़ने में देर नहीं लगेगी. ”

कलुआ की बात पर प्रधान का चेहरा उतर गया. काटो तो खून नहीं. उसने दुखी मन से गाय का पकड़ा और अपने घर की तरफ चल पड़ा. प्रधान गाय को थोड़ी ही दूर ले गया था कि वह सचमुच बिदक गई. प्रधान उसे संभाल नहीं पाया. उसके हाथ से बरेता छूट गया. गाय का पांव फिसला और गहरी खाई में गिर पड़ी.

गुस्से में अपना सिर पीटते हुए प्रधान को कलुआ के बूचन की एक और कहानी याद आ गयी. कभी गांव में किसी ने घर बनाया. गृह प्रवेश के शुभ मुहुर्त पर खाना-पीना चल रहा था. अचानक कलुआ भी वहां पहुंच गया. लोगों में दहशत-सी फैल गयी. अब कलुआ आया है तो कुछ न कुछ करेगा ही.

वही हुआ. कलुआ ने नए घर को देखकर प्रशंसा की, “मालिक बहुत अच्छा घर बनाया है. एकदम हवेली नुमा है. सोचा ही न था कि इस गांव का कोई आदमी ऐसा घर बनवा सकता है. एकदम किसी राजा का महल लगता है.”

सभी उसकी बात पर हामी भरते गए. सभी की इच् को उछा हुई कि कलुआचित सम्मान से खिला-पिला कर विदा कर दिया जाए.

ज्यों ही कलुआ को विदाई दी गयी, वह कदम बढ़ाते ही बोला, “मालिक! एक बात कहने को रह गयी. आपने इस महल की चौखट क्यों छोटी बनवाई? यह समझ में नहीं आया, यदि कभी इस घर में अनहोनी हुई, एक साथ दो लोगों की मृत्यु हो गयी और उनकी देह को एक साथ बाहर निकालना पड़े तो इस चौखट से एक साथ बाहर नहीं निकल सकेगी. ”

यह अपशकुन की बातें सुनकर मकान मालिक का मन खराब हो गया. वह कलुआ को कुछ कहता कि वह घर से बाहर कदम बढ़ा चुका था.  इस तरह कलुआ कुबचनी न सुवचन बोल पाया और न उसकी दहशत के चलते उसे कभी खाने-पीने की कमी हुई.

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