न आसमां अपना रहा, न ये जमीन ही हुई, देवभूम‍ि में इंसानों की अब जगह कहां?

बूढ़ाकेदार में बुधवार की रात को बादल फटने से कोट गांव में एक ही पर‍िवार के 7 लोग मौत की नींद सो गए. खबर है कि एक बच्ची को बचा लिया गया है. लेकिन उसका बचना अपने परिवार के बिना क्या बचना होगा. ये कहानी सिर्फ बूढ़ाकेदार की नहीं है. चमोली, पिथौरागढ़, उत्तरकाशी समेत लगभग उत्तराखंड के हर भाग में बादल फटना, पुल टूटना और भारी बारिश के चलते तबाही होना आम बात हो गई है. न्यूज चैनलों के लिए ये अब आम खबर हो चली है.

जब मैं ऐसे हादसे होते हुए देखता हूं, तो सोचता हूं कि क्या बुरा है जो हम पलायन कर रहे हैं? कभी सोते वक्त मलबे में दबकर मरने से अच्छा ही तो है कि हम परदेश में सुरक्ष‍ित हैं. संसाधनों की कमी क्या कम थी कि अब आसमान भी हमारा दुश्मन बन गया है.

उत्तराखंड को देवभूमि कहा जाता है. जहां हर दो कदम पर एक मंदिर बना हुआ है. यहां हर गांव के अपने-अपने तरह के देवता हैं. मान्यताओं में ये देवता सर्वश्रेष्ठ हैं. इनकी ताकत काफी ज्यादा मानी जाती है, लेक‍िन इन सबके बावजूद उत्तराखंड सबसे ज्यादा प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है.

मैं हमेशा वापस अपने गांव जाना चाहता हूं. वैसे बता दूं कि जहां ये हादसा हुआ. वहां से मेरा गांव ज्यादा दूर नहीं है. मैं घनसाली तहसील की बासर पट्टी में अमर सर गांव में रहता हूं. पहले मुझे लगता था कि जहां नदियां हैं. वहां सबसे ज्यादा बादल फटने और आपदा का खतरा है, लेकिन ऐसा नहीं है.

पिछले साल चमियाला से सटे कुठियाड़ा गांव में भी ऐसे ही बादल फटा और कुछ घरों को बहाकर ले गया. इससे गांव बसने का मेरा हौसला कमजोर होता जाता है.

ये मान लिया कि संसाधनों की कमी को हम अपने हाथ से दूर कर सकते हैं. रोजगार के मौके पैदा किए जा सकते हैं. काम ढूंढा जा सकता है. दो वक्त की रोटी का इंतजाम भी यहां किया जा सकता है. लेकिन प्रकृति से कौन लड़े.

न जाने किस रात आप दिनभर काम कर थक के घर आओ. थकान मिटाने की खातिर गहरी नींद में चले जाओ. लेकिन दूसरे सुबह आप उठ भी न पाओ. अब ये डर गांव में रह रहे लगभग हर व्यक्ति के मन में पैदा हो गया है.

मैं ये तो नहीं जानता कि ये आपदाएं उत्तराखंड में आना कब बंद होंगी, लेकिन इतना जरूर जानता हूं कि इनसे बचने के लिए हम अपनी आदतों और भौतिकीवाद पर नियंत्रण कर सकते हैं. ताकि पहाड़ की आबोहवा न बदल जाए. और प्रकृति यूं विकराल रूप धर कर हमें मिट्टी न कर दे.

पलायन रोकने की बात करने वाली सरकार को प्राकृतिक आपदा से बचने के लिए भी इंतजाम करने होंगे. वरना वो दिन दूर नहीं, जिस दिन हर पहाड़ी को गांव छोड़ना पड़ेगा. वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि जान बचानी है. शायद देवभूमि के देवता भी शायद हम पर भाल हों और इन घटनाओं से राहत मिले.

 – पंकज उनियाल

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