शहीद की आत्मा आज भी सीमा पर है तैनात, चीन भी इसका मुरीद

कहने को तो वो जवान 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीद हो चुका है. लेकिन आज भी वह सीमा पर तैनात है. देश की रक्षा में जुटा हुआ है.

उत्तराखंड के एक छोटे से गांव का ये जवान महज 19 साल की उम्र में शहीद हो गया. लेकिन उसने अपने पराक्रम और अदम्य साहस से एक ऐसी इबारत लिखी, जिसके चलते दुश्मन चीन को भी उसकी तारीफ करनी पड़ी.

शहीद होने के बाद भी इस जवान का भारतीय सेना में सबसे ऊंचा ओहदा है. राइफल मैन से लेकर सेना के शीर्ष अधिकारी तक इस जवान के सम्मान में सिर नवाजते हैं.

जवान की आत्मा आज भी देश की रक्षा में जुटी हुई है. सरकारी रिकॉर्ड में शहीद हो चुका ये जवान अभी सेना से रिटायर नहीं हुआ है. राइफल मैन के तौर पर सेना में भर्ती होने वाला यह जवान अब मेजर बन चुका है.

आज भी वह अन्य सैनिकों के साथ देश की रक्षा में लगा हुआ है. उसका अपना बंकर है और अब वह सैनिक के तौर पर न सिर्फ सीमा पर तैनात है. बल्कि आम लोगों के दुख-दर्द भी सुनता है.

हम आपको एक ऐसे उत्तराखंडी सैनिक के बारे में बता रहे हैं] tks कभी रिटायर नहीं होगा- जो शहीद होने के बाद भी अपनी ड्यूटी कर रहा है- सुनने में भले ही ये कहानी लगे, लेकिन है ये हकीकत.

1962 के भारत-चीन युद्ध में जसवंत सिंह हिमाचल प्रदेश में तैनात थे. यहां उन्होंने शैला और नूरा नाम की दो महिलाओं की मदद से तीन दिन तक चीनी सैनिकों को छकाया था.

अकेले के दम पर उन्होंने 300 से ज्यादा चीनी सैनिकों को मौत के घाट उतारा था. शैला और नूरा ने इसमेें उनकी मदद की. जसवंत सिंह का जन्म गुलाम भारत के पौड़ी के ब्यूरोंखाल में 15 जुलाई, 1941 को हुआ. वह 4 गढ़वाल राइफल्स में राइफल मैन के तौर पर भर्ती हुए.

19 अगस्त 1960 को वह सेना में भर्ती हुए. भर्ती होने के महज एक महीने बाद ही उन्हें अरुणाचल प्रदेश में तैनात किया गया.

अरुणाचल प्रदेश में जसवंत सिंह की याद में जसवंत गढ़़ बनाया गया है. कहा जाता है कि यहां पर आज भी उनकी ड्यूटी लगती है. सेना के रजिस्टर में उनकी ड्यूटी दर्ज होती है.

यहां उनको पूजा जाता है. कहा जाता है कि जब भी कोई आम इंसान हो या सेना का जवान हो. यहां से गुजरता है, तो उन्हें नतमस्क कर यहां से आगे बढ़ता है.

जसवंत गढ़ में अब लोग अपनी फरियादें लेकर भी पहुंचते हैं. कहा जाता है कि बाबा दूसरों के दुख भी हरते. यहां प्रचलित है कि बाबा जसवंत के बंकर में उनकी वर्दी और जूते रखे जाते हैं. जब सुबह देखते हैं, तो उनके जूते धूल से सने नजर आते हैं. वर्दी भी पहनी हुई प्रतीत होती है.

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