लोक कथा: लाटा की ईमानदारी ने बेइमानों की चालाकी को पछाड़ दिया….

एक समय की बात है. एक किसान के तीन बेटे थे. दो बेटे होशियार थे. अपने दैनिक कार्य से अधिक छल कपट और चालाकी से करते थे. उनसे वह किसान बहुत खुश रहता था. तीसरा बेटा सीधा-सरल था. अपने काम से काम रखता था. उसकी जबान भी अटकती थी. उसे लाटा-लाटा कहकर सभी चिढ़ाते थे फिर भी लाटा चिढ़ता नहीं था.

अचानक एक दिन उस किसान की मृत्यु हो गई. अभी किसान की राख पूरी तरह ठंडी नहीं हुई थी कि उसके दोनों बेटों ने खेती-बाड़ी के बंटवारे की ठान ली. उन दोनों ने नदी के किनारे वाली सिंचाई वाली जमीन तो अपने-अपने पास रखने का निर्णय लिया. बिना सिंचाई वाली जमीन लाटा को दे दी.

लाटा उन दोनों के निर्णय को कैसे टाल सकता था भला? यह भी उनकी भलमनसाहत लगी. किसान की जमीन से उसे बेदखल कर देते, तो उसमें उनके विरुद्ध लड़ने का सामर्थ्य भी नहीं था. भाइयों का निर्णय उसने मान लिया.

तीनों अपने-अपने हिस्से की खेती करने लगे. सिंचाई की जमीन अच्छी फसल देती, तो लाटा उनका मुंह ताकता रहता था. बंजर जमीन पर जो कुछ भी फसल वह उगाना चाहता था. पानी के बिना वह बीज और मेहनत सब व्यर्थ चले जाते. जब कभी बारिश समय पर होती, तो उसकी खेती पर भी हरियाली लौट आती. तब लाटा के मन में भी अच्छी फसल होने की उम्मीद होने लगी. परंतु उसके दोनों भाइयों को वह सब कहां अच्छा लगता. वे दोनों खड़ी फसल में आग लगा देते. उसकी मदद कोई नहीं करता था.

कहते हैं ऐसे असहाय प्राणी की भगवान मदद करता है. एक बार जब खेती में बुआई हुई थी. तभी एकाएक आसमान में बादल घिर आए. घनघोर बारिश के चलते नदी में बाढ़ आ गई. उसके किनारे के खेत उसकी चपेट में आ गए. लाटा बहुत खुश हुआ. उसकी बंजर खेती लहलहा उठी. उसके भाइयों को यह सब अच्छा नहीं लगा. उन्होंने खड़ी फसल में आग लगा दी. जब लाटा अपनी पकी फसल को खेत में जलते देखकर फूट-फूट कर रो रहा था, तो शिव-पार्वती की नजर उस पर पड़ गई. उन्होंने लाटा को समझाया कि फसल की राख को इकट्ठा करे और राजमहल में जाकर भूभूति बताकर बेच आए.

लाटा सहर्ष तैयार हो गया. उसने राख थैले में उठाई और राजमहल की तरफ चल पड़ा. वहां पहुंचते ही “भभूति ले लो भभूति” की आवाज लगाने लग गया. भभूति बेचने की आवाज सुनकर महल में सभी को आश्चर्य होने लगा. यह आवाज राजा के कानों तक भी पहुंची. राजा ने सोचा यह भगवान की ही माया हो सकती है. इस उम्र में उसे न तो भभूति बेचते किसी को देखा और न किस्से-कहानियों में ऐसा सुना.

राजा बहुत परेशानी में था. उसका बेटा बीमार पड़ था. बड़े-बड़े सिद्ध राज वैद्य राजकुमार का इलाज करने में विफल हो चुके थे. एक अंतिम प्रयास में राजा ने सोचा कि भभूति लगाकर भी देख लिया जाए. राजा के आदेश पर लाटा महल में प्रवेश कर गया. उसने राजाज्ञा का पालन करते हुए बीमार राजकुमार के माथे पर चुटकी भर भभूति लगाई. चमत्कार! ऐसी विचित्र माया देखकर राजा को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं आ रहा था. महीनों से बीमार राजकुमार बिस्तर छोड़कर चलने लगा. राजकुमार को स्वस्थ देखकर लाटा भी बहुत खुश हुआ. राजा ने उस पर प्रसन्न होकर बहुमूल्य उपहार दिए. जिन्हें लेकर वह अपने घर लौट आया.

लाटा अब पहले जैसा नहीं रहा. उसकी चाल-ढाल, रहन-सहन के तौर-तरीके सब बदलने लगे. उसके भाइयों को भी आश्चर्य हुआ कि लाटा इतनी अथाह सम्पत्ति कहां से ले आया? उन्हें संदेह हुआ कि वह इसे कहीं चोरी करके ही प्राप्त कर सकता है. उन दोनों ने इस संबंध में लाटा से पूछताछ की.

उसने भी साफ-साफ बता दिया कि जिस फसल में उन दोनों ने आग लगा दी थी वह उसकी राख को राजमहल में बेच आया है. उसी से उसे यह धन-दौलत प्राप्त हुआ है. उसके भाइयों को ईर्ष्या हुई. वे दोनों भी सोचने लगे. धन-दौलत प्राप्त करने का यह अच्छा तरीका है. उन दोनों भाइयों ने अपने घर के अन्न व जेवर सभी लगा डाले. यहां तक कि घर भी फूंक डाला. उनकी राख को बेचने राजमहल की तरफ चल पड़े. राजमहल में पहुंचकर उन दोनों ने भभूति ले लो, भभूति ले लो की आवाज देनी शुरू कर दी.

राजा के सिपाहियों ने उन्हें पकड़ लिया और कठोर सजा देने के बाद छोड़ दिया. वे दोनों वापिस लौट आए. उन दोनों का क्रोध सातवें आसमान पर था. उन्होंने लाटा को पीटा और उसकी गौशाला जला कर राख कर दी.

लाटा बच गया. परंतु उसकी गौशाला में बंधे जानवर मर गए. लाटा ने मरे जानवरों की खाल निकाली और भगवान का नाम लेकर मोची के पास उन्हें बेचने निकल पड़ा. रास्ते में चलते-चलते रात हो गई. वह खालों को लेकर एक पेड़ पर चढ़ गया. आधी रात का समय हो रहा था. उसे कोई आवाज सुनाई पड़ी. वह डरने लगा. यहां तक कि उसने डर के मारे सांस भी रोकने का प्रयास किया. तभी कुछ लोग उस पेड़ के नीचे आ गए.

लाटा उन्हें दम रोके देखता रहा. वे लोग डाकू थे, जो कहीं से लूट कर लाए धन का बंटवारा करने लगे थे. लाटा जो अब तक सांस रोके था. उसकी सांस उखड़ने लगी थी. सांस रोकते-रोकने का प्रयास करते जब वह हांफने लगा, तो उसके हाथों में पकड़ी खालें खड़खड़ाने लगी.

जाकू उसे भूत समझकर भाग गए. उनका लूटपाट का धन वहीं पड़ा रह गया. लाटा अब पहले जैसा सहज-सरल नहीं रह गया था. राजमहल से प्राप्त धन-दौलत ने उसे बुद्धिमान के साथ-साथ बेईमान भी बना दिया था. चालाकी भी उसने सीख ली थी. उसने भी वह धन समेटा और उसे लेकर घर लौट आया.

उसके पास अथाह धन-दौलत बढ़ती जा रही थी. उसके दोनों भाइयों की उससे ईर्ष्या होने लगी थी. वे हमेशा उससे जलते-भुनते रहते थे. उन्होंने सोचा कि लाटा अधिक दिनों तक जीवित रहा, तो उनकी आंखें हमेशा ऐसी ही शर्म से झुकी रहेंगी. उन्होंने षड्यंत्र रचना शुरू किया. एक दिन उसे जहर दे दिया. उसे तालाब में डूबो आए. यह संयोग ही था कि तालाब में डूबने पर लाटा पर विष का प्रभाव खत्म हो गया. जब लाटा तालाब से बाहर निकलने लगा तो उसके पांव में कुछ उलझने लगा. उसने सोचा की भाइयों ने डूबाने के लिए कुछ भारी चीज बांधी होंगी. परंतु उसका ऐसा सोचना भर था. जब वह बाहर निकला, तो उसके पैर अशर्फियों से भरे घड़े में फंसे थे.

वह बहुत खुश हुआ. उसे अपने भाइयों की करतूत पर हंसी आई. वह अशर्फियों से भरा घड़ा लेकर लौट आया. उसके भाइयों की नजर उस पर पड़ी तो वे चौंक गए. जिसे वे मरा हुआ घोषित कर चुके थे वह लौट आया था. वह भी प्रसन्नचित्त मुद्रा में.

उसके भाइयों ने उससे पूछा कि वह इतना खुश क्यों है? उसने हंसते हुए कहा, “जिस तालाब में विष देकर तुमने मुझे फेंका था. वहां से स्वर्ग का सीधा रास्ता जाता है. मैं उसी रास्ते स्वर्ग गया और अपने माता-पिता से मिलकर आया हूं. यह अशर्फियों से भरा घड़ा माता-पिता का ही दिया हुआ है.” उसके दोनों भाइयों के मन में लालच जोर मारने लगा. उन्होंने निर्णय लिया कि उन दोनों को भी अपने स्वर्गीय माता-पिता से मिलना चाहिए. वे दोनों भी उसी तालाब के किनारे गये और उसमें छलांग लगा दी. वे दोनों तालाब में डूब गये. तब से पहाड़ में यह कहावत है बिगड़ी औलाद से लाटी-गूंगी हो तो भी अच्छी है.

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