एकता बिष्ट: पिता ने चाय बेचकर बनाया क्र‍िकेटर, बेटी ने ऐसे ऊंचा किया नाम

उत्तराखंड ऐसी शख्सियतों से भरा हुआ है. जिनका नाम लेते ही हमारा माथा ऊंचा हो जाता है और एकता बिष्ट भी उसी में से एक हैं.

पिछले साल हुए भारतीय महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप में भारतीय महिला क्र‍िकेट टीम के प्रदर्शन को काफी सराहा गया. टीम के साथ ही इसके कुछ सदस्यों ने भी काफी ख्याती बटोरी. इनमें से ही एक थी उत्तराखंड की एकता बिष्ट.

महिला क्र‍िकेट वर्ल्ड कप में एकता ने पाकिस्तान के छक्के छुड़ाए थे. लेकिन आज भारतीय क्रिकेट टीम की सदस्य बनी एकता की राह इतनी आसान नहीं थी. उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा यहां तक पहुंचने के लिए.

एकता बिष्ट के पिता कुंदन बिष्ट सेना में हवलदार के तौर पर तैनात थे. 1988 में जब वह रिटायर हुए. तब घर चलाने के लिए सिर्फ सेना से मिलने वाली पेंशन का सहारा था. पेंशन महज 1500 रुपए मिलती थी और इतने में घर चलाना काफी मुश्किल हो जाता था.

वहीं दूसरी ओर एकता बिष्ट ने बल्ला पकड़ना शुरू कर दिया था. वह छोटी सी बच्ची घास काटने के लिए दाथुड़ी पकड़ने की बजाय बल्ला पकड़ने लगी थी. ये एकता के गांव वालों के लिए आश्चर्य की बात थी.

लेकिन कुंदन बिष्ट के लिए नहीं. उन्होंने अपनी बेटी को प्रोत्साहित किया और उसे बचपन से ही वह करने की आजादी दी, जो वह करना चाहती थी.

टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में कुंदन जी से बातचीत कर बताया कि एकता ने महज 6 साल की उम्र में क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था. एकता वह काम करने लगी थी, जिसे गांव में कोई सोच भी नहीं सकता था.

एकता की मां तारा कहती हैं कि हमने एकता को बढ़ावा दिया. लेकिन इसकी ट्रेनिंग पर आने वाले खर्चे की वजह से घर चलाना मुश्किल हो जाता था.

ऐेसे में घर का खर्चा और एकता की ट्रेनिंग का खर्च उठाने के लिए कुंदन जी ने चाय का स्टॉल लगा दिया. इसी स्टॉल के सहारे उन्होंने एकता को भारतीय क्रिकेट टीम का सदस्य बनाया.

तारा जी बताती हैं कि एकता भी घर की स्थिति समझती थी और वह ट्रायल के लिए मिले पैसों में जो बच जाते थे. उन्हें बचा लेती थी. उनके मुताबिक घर की स्थिति तब जाकर सुधरी, जब एकता 2011 में नेशनल टीम में शामिल हुई.

बता दें कि पिछले साल हुए महिला वर्ल्ड कप में उन्हें प्लेयर ऑफ द मैच चुना गया था. वह पाकिस्तान के खिलाफ जीत की हीरो रहीं.

शौहरत के इतने बड़े मुकाम पर पहुंचने के बाद भी एकता अपनी जमीन नहीं भूली हैं और आज भी उत्तराखंड व अपने गांव से उनका अटूट संबंध है.

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