पेशावर कांड के इस हीरो को ‘बड़े भाई’ कह कर बुलाते थे गांधी-नेहरू

1857 का विद्रोह हो या स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई, गढ़वाल और कुमाऊं रेजिमेंट के सैनिकों ने हमेशा इसमें अहम भूमिका निभाई है. इन्हीं सैनिकों में से एक ऐसा उत्तराखंडी था, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ‘बड़े भाई’ कहकर पुकारते थे.

 हम एक ऐसे शख्स की बात कर रहे हैं, जिन्होंने न सिर्फ उत्तराखंड का नाम इतिहास में बड़ा किया, बल्कि इन्होंने अपने काम से इंसानियत का सिर भी ऊंचा किया.

पेशावर कांड की कहानी:

23 अप्रैल, 1930 का दिन. खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में लाल कुर्ती आंदोलन जोरों पर था. पेशावर में पठानों और समर्थकों की भीड़ सड़कों पर उतर आई थी. गढ़वाली सैनिक जुलूस के बिल्कुल पास खड़े थे.

पठानों की भीड़ को अपनी तरफ बढ़ते देख अंग्रेज कप्तान किरट ने चेतावनी दी, ‘भाग जाओ, नही ंतो गोली चला दी जाएगी.‘ लेकिन निहत्थे पठान टस से मस न हुए. इस पर कप्तान किरट ने गढ़वाली सेना की टुकड़ी को हुक्म दिया, ‘‘गढ़वाली तीन राउंड फायर।‘

गढ़वाली टुकड़ी के कमांडर ने तुरंत अपना हुक्म जारी किया और टुकड़ी को आदेश दिया, ‘गढ़वाली सीज फायर‘ अर्थात गोली न चलाओ. यह सुनकर गढ़वाली सैनिकों ने अपनी-अपनी राइफलें जमीन पर टिका दीं. उस कमांडर ने कहा कि हम निहत्थे पठानों पर गोली नहीं चला सकते. और इस एक फैसले ने उस उस कमांडर को अमर कर दिया. चंद्र सिंह गढ़वाली जी की.

हुई जेल
अंग्रेजों से विद्रोह करने की चंद्र सिंह गढ़वाली जी को कड़ी सजा दी गई. इस दौरान वह देश की कई जेलों में रहे और नेहरू व गांधी से उनका राफ्ता होता रहा.

सुभाष चंद्र बोस के भी बड़े भाई
देश के ये दोनों नेता चंद्र सिंह गढ़वाली को बड़े भाई कहकर पुकारते थे. सुभाष चंद्र बोस व अन्य लोग भी उन्हें यही कहकर संबोधित करते थे. नेहरू ने गढ़वाली की पत्नी भागीरथी को भी पढ़ने लिखने में मदद की.

वहीं, चंद्र सिंह गढ़वाली और पत्नी भागीरथी के साथ महात्मा गांधी के साथ 6 महीने तक उनके वर्धा आश्रम में भी रहे. जेल से छूटने के बाद वह हमेशा गांधीगिरी में लगे रहे.

 ऐसे हुई बड़े भाई कहे जाने की शुरुआत

दरअसल चंद्र सिंह गढ़वाली को ‘बड़े भाई़‘ कहने की शुरुआत इलाहाबाद में तब हुई, जब वह नैनी जेल में कैद थे. यहां कोई उन्हें हवलदार कहकर पुकारता, तो कोई पहाड़ी. गढ़वाली को ये अलग-अलग संबोधन पसंद नहीं आते थे.

ऐसे में इस समस्या का हल निकाला उनके साथी यशपाल ने और उन्होंने सबको कह दिया कि न पहाड़ी, न हवलदार. अब से हम इन्हें ‘बड़े भाई‘ कहकर पुकारेंगे और तब से उन्हें बड़े भाई कहकर संबोधित किया जाने लगा.

चंद्र सिंह गढ़वाली गांधी और नेहरू के बहुत करीब रहे. इसी वजह से जब तक ये दोनों दिग्गज नेता जीवित रहे, गढ़वाली का इनसे अटूट बंधन रहा.

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