लोक कथा: भढ़ अजू बफौल

पंचनाम देवताओं ने भभूति के चार गोले बनाए. उन चारों गोलों को उन्होंने चार दिशाओं में फेंक दिया. कहा जाता है कि उन गोलों से चार मल्लों का जन्म हुआ. वे शूर-वीर थे. पहाड़ की मानिंद हमेशा खड़े रहते थे. मल्ल युद्ध कला में उनकी बराबरी का दूसरा नहीं था. उन्होंने नामी-गिरामी मल्लों को पटखनी दे दी थी.

जब वे थक हार गये तो वापस पंचनाम देवताओं के पास लौट आए. उन्होंने देवताओं को अपने अनुभव सुनाए और कहा कि अब वे थक चुके हैं. अब उनके लिए खाने-पीने की चीजें नहीं बचीं.

पांचों देवता परेशान. उनके लिए खाने-पीने की व्यवस्था करना कोई मामूली बात नहीं थी. उन्होंने बड़े सोच विचार के बाद यह तय किया कि मल्लों को गढ़ चम्पावत के राजा कालीचंद्र के दरबार में भेज दिया जाए. उन मल्लों से देवताओं ने साफ कहा, “हम तो खालधारी, जटाधारी जोगी हैं. हम लोग धूनी रमाते हैं, भभूति फूंकते हैं और चिमटा बजाकर अलख जगाते हैं.

भिक्षा मांगकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं. यदि कभी भिक्षा दान-दक्षिणा नहीं मिली तो उसी में संतोष कर लेते हैं मगर आप लोग तो मल्ल हैं. राजा कालीचंद्र को तुम्हारे जैसे मल्लों की जरूरत है. वहां चले जाओं. वहां तुम्हें खाना-पीना और सम्मान सब कुछ मिलेगा.”

चारों मल्ल खुश हुए और राजा कालीचंद्र के दरबार में पहुंच गये. उनके हृष्ट-पुष्ट शरीर को देख कर राजा खुश हुए. उन्हें अपने दरबार में रख लिया.

राजा कालीचंद्र के दरबार में बाईस भाई बफौल भी रहते थे. वे सभी हृष्ट-पुष्ट थे. उनकी पहलवानी भी जग जाहिर थी. उनकी एक पत्नी थी. उसका नाम दूध केला था. दूध केला को अपने बफौलों पर नाज था. बफौल भी उसे बहुत प्यार करते थे. उनका प्रेम भी किसी से छुपा नहीं था.

राजा कालीचंद्र की रानी को दूध केला और बाईस भाई बफौल के प्यार पर ईर्ष्या होने लगी. उसने एक दिन राजा कालीचंद्र को कह दिया- “जिन बफौलों पर वह इतना नाज करते हैं, उनकी दृष्टि ठीक नहीं है. वे सभी मुझ पर व्यंग्य कसते हैं.”

राजा कालीचंद्र रानी के प्रति बफौलों के अभद्र व्यवहार को कैसे सहन करता. उसने अपने महल के उन चारों मल्लों को बुलाया और बफौलों के सिर काटकर मौत के घाट उतारने का आदेश दिया.

चारों मल्ल बड़े धर्म संकट में फंस गये थे. उन्होंने राजा कालीचंद्र को समझाना चाहा कि उनके लिए यह कार्य कठिन नहीं है. लेकिन बफौल, जो धर्म-कर्म के पक्के, सदाचारी और अपनी पत्नी दूध केला को अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं, वे क्यों किसी पराई स्त्री पर कुदृष्टि डालेंगे? यह किसी को भी विश्वास नहीं आएगा.

राजा काली ने मल्लों का अनुरोध नहीं माना और तत्काल बाईस भाई बफौलों के सिर काटने का आदेश दोहरा दिया. राजा का आदेश पालन करना उनका कर्त्तव्य था. अब उनके लिए नीति-अनीति का कोई अर्थ नहीं रह गया था. वे चारों भाई बफौलों पर टूट पड़े. बफौल भी यह नही समझ पाए कि यह कार्यवाही किस कारण की जा रही है. जो भी मल्लों से प्रश्न करता वे उसी को मौत दे देते.

एक-एक कर बाईस भाई मारे गये. उनकी पत्नी दूध केला अकेले बच गई थी. उसने भी निर्णय ले लिया कि अब उसे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है. उसे सती हो जाना चाहिए. दूध केला ने सती होने की सभी तैयारियां कर लीं.

ज्यों ही दूध केला ने सती होने के लिए चिता में प्रवेश करने के लिए कदम बढ़ाया तो उसे अंतर्मन की आवाज सुनायी पड़ी. चिता की तरफ बढ़ते उसके कदम रुक गये. यह आवाज दूध केला के गर्भ में सात माह के पल रहे बच्चे की थी जिसने कहा, “मां! सती होना परेशानियों का निराकरण नहीं है. यदि तुम सती हो जाओगी तो मुझे भी स्वतः मृत्यु मिल जाएगी. हमारा वंश खत्म हो जाएगा”

दूध केला बहुत खुश हुई. उसके मन में एक नयी उम्मीद जगी. उसने सती होने का निर्णय बदल दिया. नौ माह पूरे होने पर दूध केला ने एक बच्चे को जन्म दिया. जिसको अजू बफौल नाम दिया गया.

जन्म लेने के बाद से अजू बफौल के चमत्कारों की चर्चा होने लगी. उन चर्चाओं से कालीचंद्र का महल भी अछूता नहीं रहा. चारो मल्ल अन्यायी राजा के निर्णय के उपरांत क्यों शांत रहते. उन्हें भी लगा कि निर्दोष बफौलों का वध कर उन्होंने अच्छा नहीं किया.

राजा कालीचंद्र भी मल्लों से दुखी रहने लगा था. उन्होंने एक विचित्र किस्म की शर्त राजा कालीचंद्र के सामने रख दी थी कि उनकी बराबरी का मल्ल लाएं जो कि उनका मुकाबला कर सके अन्यथा राज्य में कोई भी औरत बाल नहीं काटेगी और कोई भी मर्द दाढ़ी नहीं बनाएगा. राजा कालीचंद्र मल्लों की शर्त पर सोच में पड़ गया. उसने अपने मंत्रियों से विचार विमर्श किया, और तब राजा ने निर्णय लिया कि इन मल्लों से मुक्ति पाने के लिए अजू बफौल का साथ लेना जरूरी है.

वह सीधे अजू बफौल के पास गया और उसे उसके वंश की वीर परंपरा की याद दिलाने लगा. राजा कालीचंद्र की बातों से अजू बफौल का रक्त खौल उठा. उसने तय कर लिया कि चारों मल्लों का वध करने पर ही वह चैन लेगा.

अजू बफौल और चारों मल्लों के बीच घमासान युद्ध हुआ. अजू बफौल ने एक-एक कर मल्लों के साथ युद्ध किया. उन्हें पछाड़ कर बंधक बना लिया. राजा कालीचंद्र प्रसन्न हुआ. प्रजा को भी मल्लों के अत्याचार से मुक्ति मिली.

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