कल बिष्ट: कुमाऊं के देवता

कुमाऊं का एक दर्शनीय स्थल है विनसर. वहां के जंगल में कलू कोटड़ी रहता था. यह नाम उसके दैनिक कार्यकलापों से लोक प्रचलित था. उसका असल नाम कल बिष्ट था.

कल बिष्ट एक सामान्य आदमी नहीं था. वह बड़ा वीर और साहसी था. अपने ममेरे भाइयों के साथ वह दूर जंगल में चला जाता. वहां हरी-हरी घास मवेशियों को चराकर लौटता था. जंगल में भयानक जंगली पशु उसे मिलते थे, परन्तु उनसे भयभीत नहीं होता था. घने वृक्षों की ओट से उसे बातें करना उसे अच्छा लगता था. वह घंटों जंगली जानवरों को निहारता रहता था. उसकी आंखों में एक तरह की चुनौती होती थी. उसके ममेरे भाई उससे काफी दुखी हो जाते. वे कल बिष्ट से मवेशियों को घर के लिए लौटा लाने को कहते तो वह कहता, “अभी लकड़ियां भी काटकर ले जानी हैं.”

कल बिष्ट पेड़ों की शाखाओं पर टूट पड़ता या फिर विशालकाय वृक्षों को धराशायी करने लगता. ममेरे भाई उसे जितना रोकते उतना ही वह अपनी जिद पर उतर आता. शाम होते ही उसके ममेरे भाई जंगली जानवरों के डर से परेशान होने लगते. लेकिन उस भयानक जंगल में उसे अकेले भी नहीं छोड़ा जा सकता था. आखिर उनकी भी सहनशीलता एक दिन डगमगा गई.

बहुत समझाने पर भी जब कलू कोटड़ी नहीं माना तो ममेरे भाइयों ने उससे मुक्ति पाने की सोची. एक दिन वह अकेला था. ममेरे भाई अधिक संख्या में थे. वे सब कलू कोटड़ी पर टूट पड़े. बड़ी मुश्किल से कलू कोटड़ी उनकी गिरफ्त में आया. उन्होंने उसका गला दबाकर हत्या कर दी और उसे एक गहरे गड्ढे में गाड़ दिया.

ममेरे भाई घर लौट आए.

कलू कोटड़ी जब घर नहीं लौटा तो उसकी मां को चिंता होने लगी. मां बेचैन. रात भर वह सो नहीं सकी. सुबह दिशा खुलने का समय हो रहा था. एकाएक उसे नींद आ गई. मां को स्वप्न में कलू कोटड़ी ने कहा, “मां मैं मर चुका हूं. तुम्हारे दूध ने मुझे यह हृष्ट-पुष्ट शरीर दिया है. एक बार मैं फिर से दूध पीना चाहता हूं ताकि मुझमें प्राण लौट सकें.”

मां ने जैसे ही स्वप्न में दूध पिलाया, वैसे ही वह जीवित हो उठा और पूरी ताकत से गड्ढे से बाहर निकल आया.

चारों ओर घुप्प अंधेरा. हिलती-डुलती कुछ आकृतियां उसे दिखीं. गोया निराशा में डूबी वे सभी आकृतियां उसी की प्रतीक्षा में हों. निर्भय वातावरण में घूमने फिरने का आदी कल बिष्ट उनके समीप पहुंचा. वहां उसकी दौ सौ चालीस बांखड़ी भैंसें, 340 नई ब्यायी भैंसें, झपुआ कुत्ता, चंदुआ भैंसा और लखिमा बिल्ली उसे देखकर बहुत खुश हुए. कोई अपना खुर जमीन पर मारकर खुशी प्रकट करने लगा तो झपुआ उसके पांवों पर लोट-पोट होने लगा. और लखिमा बिल्ली तो म्याऊं-म्याऊं करती मानो उससे पूछ रही हो, “कहां गये, इस बीहड़ जंगल में हम सभी को छोड़कर.”

कल बिष्ट से उनकी खुशी देखी न गयी. उसे अहसास हुआ कि सचमुच उसके मवेशी चौपाये होते हुए भी दोपाये इंसान से अधिक संवेदनशील और प्यार करने के योग्य हैं. उसने उन्हें एक-एक कर प्यार किया, फिर सबुह दिशा खुलने से पहले घर लौट आया.

पूरे इलाके में खलबली मच गई. जिस कल बिष्ट को मार कर गाड़ आए थे, वह जीवित लौट आया था. उसके ममेरे भाई छिपते फिर रहे थे. किसी को विश्वास नहीं आ रहा था कि मृत्यु को प्राप्त हुआ व्यक्ति जीवित हो सकता है.

उधर कल बिष्ट अपना क्रोध नहीं रोक पा रहा था. घर के आंगन में पहुंचते ही उसने सभी ममेरे भाइयों को ललकारा तो गांव में एक नयी अनिष्ट की घड़ी का अनुमान सच में बदलने लगा. अन्याय के प्रति प्राणों की बाजी लगाने को उतावला कल बिष्ट के क्रोध से कोई भी अपरिचित नहीं था.

कल बिष्ट के कार्यों से गुरु गोरखनाथ भी अपरिचित नहीं थे. जब कल बिष्ट के जीवित लौट आने की खबर उन्हें पता चली तो वे भी चले आए. कल बिष्ट घर पर नहीं था. उसकी आंखों में खून पहली बार चढ़ा हो ऐसा नहीं था. इससे पहले भी वह कई बार अन्याय के विरुद्ध हथियार उठा चुका था.

गोरखनाथ को घर पर आया देख कल बिष्ट की मां की सांस अटक गई. उसने कहा, “मेरा बेटा जोगियों से चिड़ता है. जो भी जोगी उसके सामने आए वह जीवित नहीं छोड़ता. आप भिक्षा लेकर शीघ्र चले जाइये अन्यथा आप भी मार दिए जाओगे.”

“जहां तक वह इतने जोगियों को मार चुका है, वहां अगर आज मेरी भी मृत्यु लिखी होगी तो उसे कोई रोक नहीं सकता,” गोरखनाथ ने कहा और आंगन की दीवार पर बैठ गये और कल बिष्ट की प्रतीक्षा करने लगे.

सांझ झूलने लगी. कल बिष्ट के लौटने का समय हो रहा था. कल बिष्ट के हाथों एक और वध से घबरायी मां के प्राण जैसे किसी घूंटी पर आकर टिक गये थे. उसे लग रहा था कि उधर जोगी की गर्दन धड़ से अलग हुई और उसके भी प्राण फुर्र से उड़े. वह बार-बार गोरखनाथ की तरफ देखती तो उनके चेहरे पर शान्त एवं अविचलित भाव देखकर सांस रोककर रह जाती. उसने कई बार कहा- “जोगी तुम यहां से अभी भी चले जाओ, मेरा बेटा तुम्हें मार डालेगा.”

परन्तु गोरखनाथ उसके शब्दों को, उस मां के चेहरे को देखते रहे जो अपने पुत्र को क्रूर, निर्दयी जैसी उपमाएं दे चुकी थी. कल बिष्ट जंगल से लौट आया.

गोरखनाथ को आंगन में बैठा देखकर कल बिष्ट क्रोध से उबलने लगा. आंखों में खून चढ़ते समय नहीं लगा. उसने अपना कुल्हाड़ा उठाया और तेजी से गोरखनाथ की तरफ बढ़ा. मवेशियों ने अपने कदम गोशाला की तरफ बढ़ाए और एक-एक कर अपनी खूंटी पर खड़े हो गए. आंगन में पहुंचकर कल बिष्ट ने शेर की भांति दहाड़ा- “ऐ जोगी! इस दीवार पर बैठा तू अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहा है.”

कल बिष्ट के क्रोध को देखकर गोरखनाथ जरा भी विचलित नहीं हुए बल्कि मुस्कुराने लगे. उन्होंने चुटकी भर भभूति निकाली और कल बिष्ट की तरफ फूंक दिया.

“तुम इस गांव-घर में पहली बार आए हो, ऐसा प्रतीत होता है. थोड़ा और प्रतीक्षा करो. मै मवेशियों को उनकी खूंटी पर बांध आता हूं.”

और कल बिष्ट दनदनाते गौशाला की तरफ चला गया. उसका पीछा करते गोरखनाथ भी गौशाला पहुंचकर सामने बैठ गए. लेकिन आज मवेशियों को बांधते-बांधते कल बिष्ट को समय लग रहा था. वह जिस फुर्ती से हाथ चला रहा था उस फुर्ती से मवेशी उससे बंध नहीं पा रहे थे और रोज की भांति कोई पशु अपनी प्रवृति के अनुरूप दाएं-बाएं मुंह भी नहीं मार रहा था.

ऐसा क्या हुआ कि सभी शांत चित्त खड़े अपनी खूंटी पर बंधने की प्रतीक्षा कर रहे हैं. कल बिष्ट का आश्चर्य बढ़ता गया. उसे लगा यह जोगी साधारण नहीं हो सकता. यह या तो कोई जादू टोना करने वाला है या फिर कोई पहुंचा हुआ सिद्ध है. वह सोचता रहा. उसका क्रोध जो सातवें आसमान को छू रहा था, वह धीरे-धीरे शांत होता चला गया. जब तक सभी मवेशी खूंटी से बांधता तब तक कल बिष्ट मानसिक और शारीरिक रूप से बुरी तरह थक चुका था.

उसकी हालत देख गोरखनाथ मुस्कुराये और बोले, “कल बिष्ट तुम बहुत थक चुके हो. मेरा भाग्य कि तुममे मेरा वध करने की सामर्थ्य नहीं बचा.” “हां, ठीक कह रहे हो. मैंने तुम्हें मारने का निश्चय किया था परन्तु-”

“क्या तुम अब मुझे नहीं मारोगे. ओह,” यकायक गोरखनाथ गंभीर हो गये. “तुम्हें अफसोस क्यों हुआ जोगी.”

“अफसोस इस बात का है-जिसे मृत्यु चाहिए उसे तुम नहीं दे सकते और जो मरना नहीं चाहते उन्हें तुम मृत्यु देते रहे हो-अब मेरी इच्छा जीवित रहने की नहीं है. तब तक के लिए जीवित रहना चाहता हूं जब तक मृत्यु की इच्छा को भूल नहीं जाऊं. ”

“ठीक है, मैंने अपना निश्चय बदल दिया है. अब तुम्हें जो कुछ मांगन��� है वह मुझसे ले लो.”

“जिन मवेशियों से तुम इतना प्यार करते हो उनका एक खप्पर दूध दही मुझे दे सको तो दे दो.”

“ इसमें कौन सी बड़ी बात है. चलो, वापस मां के पास तुम जितना चाहो ले लो.” कल बिष्ट वापस लौटा आया. पीछे-पीछे गोरखनाथ भी. दोनों के साथ आते देख कर मां की आंखें खुली की खुली रह गईं. सशरीर चलते जोगी और बेटे के शांत चित्त चेहरे को देखकर उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. उसने अनुमान लगाया सचमुच यह कोई साधारण जोगी नहीं है. कल बिष्ट का हृदय परिवर्तन करने वाला कोई सिद्ध है.

“तुम लौट आए जोगी, तुम सचमुच लौट आए हो.”

“हां, कल बिष्ट ने मुझे मारने से मना कर दिया है.”

“अच्छा! आश्चर्य”

“मुझे उन मवेशियों का दूध दही चाहिए. जीवित रहने तक उसी का सेवन करूंगा.” मां दही की हंडिया उठाकर ले आयी. यह कोई बड़ी बात नहीं थी उसके लिए. उसने एक ही बार में जोगी को खप्पर भर देने का प्रयास किया. परन्तु ऐसा नहीं हुआ, वह बारी-बारी से खप्पर लाती रही. खप्पर फिर भी अधूरा रहा.

कल बिष्ट को आश्चर्य हुआ. उसकी समझ में आने लगा कि यह सिद्ध पुरुष हैं. यकायक उसने घुटने टेक कर गोरखनाथ को प्रणाम किया. गोरखनाथ ने कल बिष्ट को गले से लगा लिया और अपना शिष्य बना लिया. वही कलूकोटी, कल बिष्ट और कलुआ बीर आदि नामों से कुमाऊं के लोगों में देव के रूप में पूजनीय है.

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