वो पक्षी जो आज भी रटता है ”तुम कौन-कौन हो”

किसी गांव में एक भाई और एक बहन रहते थे. भाई-बहन का प्यार जगजाहिर था. वे दोनों साथ रहते, साथ खाते-पीते और साथ ही खेलते थे. दिन बीतते गए. दोनों बच्चे जो छोटे थे. वे समझदार और बड़े हो गये. फिर एक दिन वह घड़ी भी आ गयी जब बहन विवाह कर ससुराल चली गयी.

भाई अकेला रह गया. वह उदास रहने लगा. उसके जीवन की जैसे सारी खुशी चली गयी. उसे देखकर उसकी ईजा ने कहा, “बेटा, तू इस तरह उदास क्यों रहने लगा है. तेरी दीदी उत्तरायण पर आएगी, पंचमी, फूलदेई, होला और तीज त्योहार पर आएगी. उस समय देखना तेरी दीदी कितनी सुंदर लगेगी. उसकी नाक पर नथ, पांव पर झांवर, कानों पर कर्णफूल और गले में चरेऊ (मंगलसूत्र) पहने वह बहुत सुंदर लगेगी, तू उसे देखता रह जाएगा.”

त्योहार आएंगे उसकी बहन उससे मिलने आएगी, इसी आशा में भाई बैठा रहा. दिन नजदीक आते गये. भाई के मन में बहन से मिलने का उत्साह नये सिरे से जाग उठा. गांव में दूसरी बहूं-बेटियों का आना-जाना शुरू हो गया. गांव में चहल पहल शुरू हो गयी, गीत-भगनौल और झोड़े शुरू हो गए. गीत-संगीत बजने लगा. किस्से कहानी का दौर चल पड़ा. अपनी ससुराल की बातें शुरू होतीं जो खत्म होने को ही नहीं आतीं. अच्छी-बुरी बातों का अनुभव बंटने लगा.

परन्तु उसकी बहन नहीं आयी. वह उदास हो गया. आज आयेगी या फिर कल इसी उम्मीद पर त्यौहार आया और अपनी खुशियां बिखेर गया. परन्तु उसके घर में उदासी छाई रही. बहना की राह देखते-देखते उसकी आंखें लाल हो गयीं. रोते-रोते उसका कंठ सूख गया. बहन की याद में जैसे वह नीम बेहोशी में चला गया.

गांव-घर में हाहाकार मच गया. क्यों नहीं आयी वह. उसे आना चाहिए था. उसके न आने के कई कयास लगाए जाने लगे. अब उसके बेहोश होने की खबर गांव में फैल गयी तो गांव की बहू-बेटियां उसे मिलने आयीं.

बड़ी कोशिश के बाद उसमें चेतना लौटी, तो उसने देखा गांव की बहू-बेटियों ने उसे घेर लिया है, वे सभी चारों तरफ खड़ी उसे निहार रही हैं. उसने उन सभी के बीच जेवरों से लदी सजी-संवरी अपनी बहन को ढूंढा तो उसे नहीं दिखी।

वह चीख पड़ा- “तुम कौन-कौन हो?”

इस अप्रत्याशित प्रश्न को छोड़कर वह फिर से नीम बेहोशी में चला गया.

इस कथा में भाई-बहन का अमिट प्रेम प्रदर्शित है. आज भी ‘तुम कौन-कौन हो’ की रट लगाता पक्षी इस अमर कथा की याद दिलाता है.

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