बकरा और बकरी की होश‍ियारी

एक बकरा और बकरी साथ-साथ रहते थे. दोनों के बीच गहरा प्रेम था. एक बार बकरी ने दो पाठों को जन्म दिया. बकरा बहुत खुश हुआ कि अब उसका परिवार बढ़ रहा है. लेकिन कुछ दिन के बाद उसकी खुशी को ग्रहण लग गया. जंगल की ओर से एक सियार दबे पांव आया और उसके दोनों पाठों को ले गया.

बकरी फूट-फूट कर रो पड़ी. बकरे ने उसे समझाया और दिलासा दिया कि हमारे और पाठों का सिर्फ इतने दिनों का ही साथ लिखा होगा. ज्यों-ज्यों दिन बढ़ते गये, बकरी उन पाठों को भूलती गयी. कुछ महीने के बाद उसने फिर से गर्भ धारण किया और दो पाठों को जन्म दिया. संयोगवश इस बार भी सियार आया और दोनों पाठों को उठाकर ले गया.

बकरी बहुत परेशान हो गयी. वह बकरे पर बरस पड़ी. मेरे इस बार भी पाठे मारे गए. तुम्हें पता भी नहीं चला. मैं कहे देती हूं कुछ उपाय करो. बकरे ने बकरी की पीड़ा को महसूस किया और वचन दिया कि भविष्य में जब भी उसके पाठे पैदा होंगे, तो वह उनकी जरूर देख-रेख करेगा. इन शब्दों को बकरी ने गांठ से बांध लिया.

तीसरी बार भी बकरी के दो पाठे हुए. बकरी ने बकरे को उसे वचन की याद दिलायी.

“इस बार कोई न कोई उपाय करो. मैं तुम्हारे साथ घास चरने नहीं जाऊंगी. तुम भी इनकी देखरेख के लिए यहीं रहो.”

बकरे के पांव तले जमीन खिसक गयी. वह बोला, “यह तो कोई उपाय नहीं है. जंगल घास चरने नहीं जाएंगे तो खाएंगे क्या. बिना खाये-पिये हम कब तक रहेंगे.”

“तो मैं अकेली इनकी देखभाल करुंगी. आखिर मां का दिल है मेरा.”
“यह तो मैं भी समझता हूं. ऐसा कोई उपाय भी तो नहीं है कि सियार के आने का पता पहले लग जाए और हम सावधान हो जाएं. वह कभी भी कहीं से भी आ सकता है. तू अकेली कर भी क्या सकती है.”

बकरे ने यह बात कह तो दी, परन्तु उसे भी चिन्ता खाने लगी. वह गहरी सोच में डूब गया. किसी और की बात होती तो अनसुनी कर देता, परन्तु यह तो उसी की बकरी की परेशानी थी. उसने अपना दिमाग दौड़ाया और फिर गहरे सोच-विचार के बाद कहा, “एक बात कहूं बकरी, यदि हम ज्यादा सोच विचार करते रहे तो कोई हल नहीं निकलेगा. अब ऐसा करते हैं मै पास के जंगल में चला जाता हूं और वहां से सियार पर नजर रखता हूं. ज्यों ही वह आएगा मैं तुझे आवाज दे दूंगा कि ये बच्चे क्यों रो रहे हैं इन्हें चुप क्यों नहीं कराती? मेरे शब्दों को सुनते ही तू इन पाठों को चिकोटी काट देना, जिससे ये जोर-जोर से रोने लग जाएं. तू कहना शुरू कर देना कि ये बच्चे सियार का कलेजा खाने को मांग रहे हैं. मैं कहां से लाकर दूं. घर में बासी-कुबासी कलेजा होता तो उसे दे देती. इस समय सियार आए तो उसे मार कर कलेजा निकाल भी लूं तो कहां से?”

मैं कहूंगा, “अरी चिल्लाना बंद कर, बच्चों को भी चुप करवा ले. हो हल्ला सुनकर सियार भाग जाएगा. वो देख एक सियार घर की ओर आ रहा है. मैं उसका कलेजा अभी निकाल कर बच्चों के लिए ला रहा हूं.”

बकरी को यह बात पसंद आ गयी. बकरा तेजी के साथ सामने के जंगल में चला गया. थोड़ी देर में सियार आया. बकरे की नजर उस पर पड़ गयी. उसने बकरी को अपनी योजना के अनुसार आवाज लगा दी- “ अरी बकरी, ये दोनों पाठे क्यों रो रहे हैं?” बकरी ने दोनों पाठों को चिकोटी काट दी, वे दोनों रो पड़े. उसके बाद बकरी ने वैसा ही कह दिया जैसा बकरे ने बकरी को सिखाया था.

सियार ने बकरे और बकरी की आवाज सुनी तो उसके पांव तले जमीन खिसक गयी. वह उल्टे पांव भाग खड़ा हुआ. उसे भागते देख जंगली जानवरों को आश्चर्य हुआ कि कोई भारी संकट आया होगा इसलिए सियार दुम दबाकर भाग रहा है. सियार पर लंगूर की भी नजर पड़ी तो उसने हिम्मत करे उसे रोका और पूछ- “ओ सियार भाई, आज तुम्हारी ये भागमभाग क्यों हो रही है. कहां के लिए भाग रहे हो?”

सियार ने अपने पांव जमीन पर टिकाए और अपने दिल का हाल लंगूर को कह सुनाया. लंगूर उसकी बात सुनकर खूब हंसा. उसने कहा, “सियार भाई तुम्हारी तो मति मारी गयी है. क्या बकरा भी कभी सियार को मार सकता है?”

“मैं अपने कानों से सुनकर आ रहा हूं. वह बकरा अपनी बकरी से कह रहा था कि मैं अभी सियार का कलेजा निकालकर पाठों के लिए लेकर आ रहा हूं. उसने मुझे देख भी लिया था.”

लंगूर को सियार की बात पर आश्चर्य हुआ. उसने कहा, “चलो, मैं तुम्हारे साथ चलूंगा. देखता हूं कैसा बकरा है वह.”

“लंगूर भाई. मैं अवश्य तुम्हें ले चलूंगा तुम्हें वहां, मगर एक शर्त है?”

“वह क्या?” “तुम अपनी पूंछ से मेरी पूंछ बांध लो और मुझे अपनी पीठ पर बिठा लो तभी.”

लंगूर ने सियार की अपनी पूंछ से पूंछ बांध ली और उसे पीठ पर बैठाकर ले गया. दोनों बकरी के पास पहुंचे ही थे कि बकरे की नजर उन पर पड़ गयी. वह जोर-जोर से बोला “अरे बकरी इन पाठों को चुप करा दे. देख मेरा दोस्त लंगूर सियार को अपनी पूंछ से बांध कर ला रहा है. धैर्य रख मैं उस सियार का कलेजा निकाल कर जल्दी ले आउंगा.”

इतना सुनकर सियार की सिट्टी-पिट्टी गोल. उसकी सांस अटक गयी. उसने कान लगाकर सुना तो बकरा कह रहा था. “अरे ओ लंगूर तो बड़ा बेशऊर है. तुझे जरा भी शर्म नहीं. तू तो चार सियार लाने की बात कह कर गया था और तू एक ही उठाकर ला रहा है. इससे बकरी और उसके पाठों का पेट भला कैसे भरेगा.”

बकरे ने अपनी बात पूरी भी नहीं कि थी कि सियार ने लंगूर की पीठ से छलांग लगायी और भाग गया. उसके पीछे- पीछे लंगूर भी, जान बची तो लाखों पाए. दौड़ते-दौड़ते जब दोनों एक दूर पहाड़ी पर पहुंचे तो उन्हें आगे का रास्ता नहीं सूझा. आगे गहरी खाई थी. रास्ते की तलाश में दोनों ने खाई में छलांग लगा दी. वे दोनों मर गए. उधर बकरी निर्भय और निश्चिंत होकर अपने पाठों को पालने लगी.

 

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