लोक कथा: सत्य वचन

एक गाय हमेशा जंगल जाती थी. उसका एक बछड़ा था. गाय जिस दिन हरी-हरी घास से पेट भर खाती उस दिन बछड़ा छककर दूध पीता. बछड़े को अधिक दूध पिलाने की लालसा में गाय जंगल में दूर-दूर तक निकल जाती. हरी घास का लोभ उसे संवरण नहीं हो पाता था.

घास चरते-चरते एक दिन गाय काफी दूर निकल गयी. जंगल में एक बाघ था. बाघ की नजर जैसे ही गाय पर पड़ी तो वह खुशी से झूम उठा. वह गुर्राया, डर के मारे गाय की हालत पतली हो गयी. वह बोली, “घर पर मेरा एक बछड़ा है. जब मैं भरपेट घास नहीं चरती तो छककर उसे दूध नहीं पिला पाती. वह मेरा इन्तजार कर रहा होगा, आज मुझे नहीं खाओ. मुझे घर जाने दो. उसे दूध पिलाकर मैं लौट आऊंगी.”

गाय की बात पर बाघ खूब हंसा-बोला, “मुझे बेवकूफ समझ रही हो. एक बार जान बचाकर जाओगी तो फिर क्यों आओगी. मुझे तो भूख लगी है- मैं तुझे अपना भोजन बना कर रहूंगा.”

गाय ने बड़ी मिन्नतें कीं. आखिकार वह बाघ को विश्वास दिलाने में सफल हो गई. बाघ का मन बछड़े की बात पर पिघल गया- फिर भी उसने गुर्राते हुए कहा, “मैं तेरे लौटने की प्रतीक्षा करूंगा. वरना घर पर आकर तुझे और तेरे बछड़े को भी मार कर खा जाऊंगा.” गाय के कंठ में अटके प्राण वापस लौट आये उसे अपार खुशी हुई, उसने राहत की सांस ली.

परन्तु यह राहत उसे अधिक देर खुशी न दे सकी. ज्यों-ज्यों उसके पांव घर के नजदीक पहुंचे, उसे बाघ को दिया वचन याद आता रहा. बछड़े के करीब पहुंचने तक गाय उदास हो गयी.

घर पहुंचने पर उसने उदास मन से बछड़े को दूध पिलाया, उसे चूमा, प्यार किया. एकाएक बाघ को दिया वचन याद आते ही उसके आंसू छलछला आए. बछड़े को आश्चर्य हुआ. उसने गाय से पूछा.गाय ने बछड़े को सारी बात जस की तस बता दी. बछड़ा धैर्य से सारी बात सुनता रहा और फिर सहजता से बोला, “इजा इसमें रोने की क्या बात है. तुम मुझे भी बाघ मामा के पास ले चलो. मै उन्हें मना लूंगा.”

“नहीं-नहीं बेटा वह जंगली जानवर है, उनके मन में दया भाव कुछ नहीं होता. वे सिर्फ अपने स्वार्थ तक सीमित होते हैं.”

“नहीं इजा. एक बार मुझे भी ले चलो.” बछड़े ने जिद की.

बछड़े की जिद के आगे गाय असहाय हो गयी, वह बोली, “यदि तू ऐसा चाहता है तो चल.”

आगे-आगे गाय और उसका पीछा करता बछड़ा जंगल को चल पड़ा. साथ-साथ चलने के दौरान जीवन-मरण की बातें हुईं. कदम जो थोड़ी देर पहले तक पूरी ताकत से बढ़ रहे थे, वे भी अपना बोझ ढोने में असमर्थ होने लगे. बड़ी मुश्किल से वे दोनों बाघ के पास पहुंचे और उसके सामने खड़े हो गये.

बाघ खुश हुआ. गाय को अपने प्राणों से ज्यादा बछड़े के मारे जाने का भय सताने लगा. उसकी ममता पूरी तरह से पगला सी गयी. वह बोली, “मैं अपनी कौल पर आयी हूं. बाघ दा अब मुझे खा लो. पेट भर कर खा लो. फिर बछड़े को खाना. ये देखो मैं अकेली नहीं आयी हूं- बछड़ा भी साथ लायी हूं.”

बछड़ा बहुत छोटा था. परन्तु बहुत होशियार था, उसने कहा, “बाघ मामा प्रणाम. ये मेरी इजा है. तुम पहले इसे नहीं मुझे खाओ.” बछड़े को रोकती हुई गाय बोली, “नहीं, पहले मुझे.”

“नहीं, नहीं” कहते बछड़ा बाघ के सामने चला गया.

“नहीं, नहीं मैं तुझे पहले नहीं खाऊंगा, तेरी इजा को भी नहीं. तुम दोनों ने मिलकर मुझे हरा दिया, एक तू है जो अपनी इजा के लिए प्राण देने पर तुला है और एक तेरी इजा है- जो अपने सत्य वचन पर यहां तक चली आयी. मैं तो यह देख रहा था कि तेरी इजा लौटेगी भी या नहीं. मुझे उसे खाना होता तो उसी समय वापिस क्यों जाने देता?”

बाघ ने बछड़े को बहुत प्यार किया और उन्हें उनके घर की सरहद तक छोड़ने आया. किसी ने सच ही कहा है, “सच्चे प्राणी को किसी का भय नहीं होता.”

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