मुख्यमंत्री की ये बात सच हुई, तो 2025 तक खत्म हो जाएगा पलायन!

मुख्यमंत्री त्र‍िवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखंड इन्वेस्टर समिट में कहा कि 2025 में उत्तराखंड का कायाकल्प हो जाएगा. मुख्यमंत्री की बात पर विश्वास करें तो संभव है कि पलायन पर लगाम लग जाएगी. भूतिया गांवों में यहां के रहिवाशी लौट आएंगे. चार धाम तक हाइवे पहुंच चुकी होगी और पहाड़ का हर गांव और गली, हाईटेक हो चुकी होगी. मुख्यमंत्री के मुताबिक 2025 में जब उत्तराखंड अपनी रजत जयंती मना रहा होगा, तब इसका कायाकल्प हो चुका होगा. हालांकि वह अपने भाषण में ये साफ-साफ कहने से बचे कि पलायन पर रोक लगेगी या नहीं?

खैर, उत्तराखंड इन्वेस्टर सम‍िट में आए निवेश और मुख्यमंत्री की बातों पर विश्वास करें, तो जरूर 2025 तक उत्तराखंड से पलायन का नामो-निशान मिट जाएगा. लेक‍िन जब सारी चीजें जैसे कही जा रही हैं, वैसे ही हों तो.

निवेश पहाड़ों के लिए आया है:
राज्य में पहली बार इन्वेस्टर सम‍िट का आयोजन किया गया था. इसमें मुख्यमंत्री त्र‍िवेंद्र सिंह रावत ने बताया कि जो न‍िवेश आया है. वह ज्यादातर पहाड़ी भाग के लिए आया है. उन्होंने बताया कि निवेशकों ने इस बार पहाड़ी भाग में ज्यादा रुचि दिखाई है.

मुकेश अंबानी तैयार करेंगे ‘डिजिटल देवभूम‍ि’:
देश के सबसे अमीर शख्स और मोबाइल इंडस्ट्री में तहलका मचाने वाले मुकेश अंबानी डिजिटल देवभूम‍ि तैयार करेंगे. इसके लिए वह 4 हजार करोड़ रुपये खर्च करने वाले हैं. अगर ऐसा होता है, तो उत्तराखंड के सैकड़ों गांवों के स्कूलों में हाईटेक इंटरनेट पहुंच जाएगा. मतलब बच्चों की श‍िक्षा का स्तर काफी बेहतर हो जाएगा. जब भी श‍िक्षा का स्तर बेहतर होता है, तो उसके आस-पास की दूसरी चीजें भी बेहतरीन होने लगती हैं.

ग्रामीण भाग की बदलेगी तस्वीर?
सम‍िट में मुख्यमंत्री ने ये भी बताया कि सबसे ज्यादा निवेश पर्यटन, फूड प्रोसेस‍िंग, जैविक खेती व डेयरी उद्योग में आया है. कृष‍ि क्षेत्र में 1400 करोड़ रुपये का निवेश हुआ है. अगर ये निवेश जमीन पर हकीकत बनता है, तो यहां के ग्रामीण अंचल की तस्वीर बदल सकती है. पर्यटन को बढ़ावा मिलने से लोग होम स्टे का कारोबार शुरू कर सकते हैं. जैव‍िक खेती को बढ़ावा मिलने से खेती-बाड़ी से दूर हुए लोग वापस इसकी तरफ लौट सकते हैं. कहीं-न-कहीं इससे राज्य में नये रोजगार और स्वरोजगार शुरू होंगे.

कुल निवेश और रोजगार:
दावा किया जा रहा है कि इस सम‍िट के दौरान कुल 1.20 लाख करोड़ रुपये का निवेश आया है. निवेश करने वालों में देश के बड़े-बड़े उद्योग घराने शामिल हैं. रिलायंस, जिंदल ग्रुप, अडानी ग्रुप, डाबर और पतंजलि समेत अन्य. बताया जा रहा है कि इस निवेश के बूते राज्य में 3.50 लाख सीधे रोजगार पैदा होंगे.

…तो फिर परदेश जाने की नहीं पड़ेगी जरूरत?
इस तरह अगर हम देखें तो इस इन्वेस्टर सम‍िट ने उत्तराखंड से पलायन खत्म करने का पूरा इंतजाम कर दिया है. अपना गांव छोड़कर परदेश गया उत्तराखंडी इसलिए ही अपना घर-बार छोड़ता है. क्योंकि उसे यहां रोजगार नहीं मिलता. आय के पर्याप्त साधन नहीं मिलते. अब अगर ये सवा लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश सफल होता है और ये सच में 3.50 लाख रोजगार पैदा कर पाता है, तो 2025 तक उम्मीद जरूर कर सकते हैं कि पलायन अगर शून्य नहीं, तो ना के बराबर जरूर हो जाएगा.

लेक‍िन स‍िक्के का दूसरा पहलू भी देख लें:
इससे पहले कि हम इस निवेश और सीधे रोजगार के वादों से खुश होएं. थोड़ी छुपी हुई हकीकत का भी सामना कर लेते हैं. दैनिक भास्कर के पत्रकार राजू सजवाण कहते हैं कि यह कहना सही नहीं है कि जितना अध‍िक निवेश होगा, उतने ही ज्यादा रोजगार भी पैदा होंगे.

वह एक लेख में इन्वेस्ट उत्तराखंड का हवाला देकर लिखते हैं, ”इस वेबसाइट पर एक रिपोर्ट है. जिसमें 2016 से राज्य में अब तक के निवेश की जानकारी दी गई है. इसमें पता चलता है कि 2016 से अब तक बड़े उद्योगों के 47 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है. ये उद्योग 5578.82 करोड़ रुपये का निवेश करेंगे. इन उद्योगों में 10052 लोगों को रोजगार मिलने की बात कही गई है.”

”दूसरी तरफ, इन तकरीबन तीन सालों के दौरान छोटे व मझोले उद्योगों के 1490 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है. इनका न‍िवेश 3293 करोड़ का होगा, लेक‍िन ये 23057 लोगों को रोजगार देंगे. बड़े उद्योगों के मामले में इनका निवेश करीब 2300 करोड़ रुपये कम है. सजवाण कहते हैं कि छोटे उद्योग भले ही कम निवेश करते हों, लेक‍िन वह बड़े उद्योगों के मुकाबले ज्यादा लोगों को रोजगार देते हैं.”

ये है वजह:
सजवाण अपने लेख में इसकी वजहें भी गिनाते हैं. वह बताते हैं कि अक्सर बड़े उद्योग मानव श्रम के मुकाबले तकनीक पर ज्यादा निर्भर रहना पसंद करते हैं. इसकी वजह से कम कर्मचारियों की भर्ती की जाती है. दूसरी तरफ, जिन कर्मचारियों की भर्ती भी होती है, वे सब प्रश‍िक्ष‍ित होते हैं. इससे पूरी संभावना है कि ये कर्मचारी भी बाहर से यहां लाए जाएं. ऐसे में ज्यादा निवेश के आने से ये उम्मीद लगा लेना कि ज्यादा रोजगार भी पैदा होंगे, बेमानी साबित हो सकता है. राजू छोटे उद्योगों को बढ़ावा देने पर जोर देते हैं.

उम्मीद और आशाओं की जमीन पर खड़े हम:
राज्य के पहले इन्वेस्टर सम‍िट में वादों की पुढ़‍िया काफी अच्छी बंधी है. अब देखना होगा कि ये पुढ़‍िया जब खुलेगी, तो जमीन पर कितने दाने गिरते हैं. उससे कितनी फसल पैदा होती है. तब तक उम्मीद और संभावनाओं के पानी से पलायन मुक्त उत्तराखंड का सपना सींचिए और 2025 का इंतजार कर‍िये. जब इन वादों की पुढ़‍िया से गिरे दानों से पनपी फसल को काटने का समय होगा.

Leave a Reply