उत्तराखंड आंदोलन: 185 साल पहले शुरू हुई थी लड़ाई…

उत्तराखंड भले ही 9 नवंबर, 2000 को देश का एक अलग राज्य बना हो. लेक‍िन इसे अलग राज्य बनने में 185 साल लग गए. इसकी शुरुआत होती है सन 1816 से. इस दौरान नेपाल और अंग्रेजों के बीच सुगौली संध‍ि हुई.

जब यह संध‍ि हुई, तो अंग्रेजों ने उत्तराखंड में आना चाहा. तब उत्तराखंड‍ियों ने उनकी इस मांग को स्वीकार कर लिया, लेकिन एक शर्त के साथ. शर्त रखी गई कि वह पहाड़ को अलग इकाई के रूप में रखेंगे. लेक‍िन अंग्रेज भूल गए.

इसके बाद 1897 में लोगों ने रानी विक्टोरिया को उनका वादा याद दिलाया. उनके सामने मांग रखी गई कि ब्रिटिश कुमाऊं (तत्कालीन) को अलग प्रांत बना दिया जाए. (*ब्रिट‍िश कुमाऊं: इसमें प्रदेश का वर्तमान गढ़वाल मंडल टिहरी रियासत को छोड़कर शामिल था.). ब्रिट‍िश महारानी को याद दिलाए जाने के बाद भी इस मोर्चे पर कोई काम नहीं हुआ.

बनी उत्तराखंड की प्रथम संस्था
अगला प्रयास 1916 में उत्तराखंड की प्रथम संस्था- कुमाऊं परिषद के गठन के रूप में हुआ. इस संस्था के बैनर तले राजा आनंद सिंह, त्र‍िलोक सिंह रौतेला, डेनियल पंत, नित्यानंद जोशी, उत्तम सिंह रावत, हाज़ी नियाज़ मोहम्मद व अन्य ने तत्कालीन संयुक्त प्रांत के गवर्नर को ज्ञापन भेजा. यहां भी पुरानी मांग दोहराई गई. गवर्नर ने कुमाऊं परिषद को साइमन कमीशन के पास जाने के लिए कहा.

नेहरू ने भी उठाई मांग
1938 आते-आते कुमाऊं मंडल के बाद गढ़वाल मंडल से भी यह मांग उठने लगी. इसी साल के 5-6 मई को हुए कांग्रेस के श्रीनगर सम्मेलन में पृथक राज्य की मांग उठाई गई. इस सम्मेलन में खुद पंडित जवाहरलाल नेहरू, प्रताप सिंह नेगी और विजयालक्ष्मी पंड‍ित शामिल थीं. इस सम्मेलन में नेहरू ने भी अलग पहाड़ी राज्य का समर्थन किया. उन्होंने कहा था, ”इस पर्वतीय क्षेत्र के निवास‍ियों को उनकी पर‍िस्थ‍िति के अनुरूप खुद फैसला लेने और संस्कृति को समृद्ध करने का अध‍िकार मिलना चाहिए.”

गोविंद वल्लभ पंत ने रोका प्रस्ताव
1946 में तत्कालीन संयुक्त प्रांत के प्रधानमंत्री गोविंद वल्लभ पंत के सामने यह मांग रखी गई. आजादी के बाद 1952 में राज्यों के पुर्नगठन के लिए बनाए गए पणि‍कर आयोग ने भी इस मांग का समर्थन किया. लेकिन पंत ने इसे सिरे से खार‍िज कर दिया. उन्होंने कहा कि पहाड़ में संसाधनों और रोजगार की कमी है. ‘स्वतंत्रता संग्राम में कुमाऊं का योगदान’ किताब में इस घटना का जिक्र मिलता है.

इसके बाद 1952 में कांग्रेस पार्टी के सचिव कॉमरेड पीसी जोशी ने यह मांग उठाई. चंद्रसिंह गढ़वाली भी अलग राज्य के पक्ष में थे. उन्होंने इसके लिए तत्कालीन पीएम जवाहर लाल नेहरू को ज्ञापन सौंपा.

हिमाचल में हो जाता उत्तराखंड
22 मई, 1955 को एक नई मांग उठी. नई दिल्ली में पर्वतीय जन विकास समिति ने उत्तराखंड को प्रस्तावित हिमाचल राज्य में शामिल करने का प्रस्ताव सौंपा. 1956 में पृथक हिमाचल राज्य बनाए जाने की मांग को पुर्नगठन आयोग ने ठुकरा दिया. लेकिन तत्कालीन गृह मंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने अपने विशेषाध‍िकार का इस्तेमाल किया. और हिमाचल की मांग को सैद्धांतिक रूप में स्वीकार कर लिया. पर उत्तराखंड को लेकर वह चुप रहे.

उत्तराखंड को अलग राज्य बनाए जाने की मांग 1966 और 1968 में भी उठी. लेकिन कुछ नहीं हुआ. इसके बाद 1970 में उत्तराखंड‍ियों ने सड़क पर उतरना शुरू कर दिया. 1971 में इंद्रमण‍ि बडोनी, मानवेंद्र शाह, नरेंद्र सिंह बिष्ट और लक्ष्मण सिंह ने कई जगह आंदोलन किए. 1972 में ऋष‍िवल्लभ सुंदरियाल व पूरन सिंह डंगवाल समेत अन्य ने गिरफ्तारी दी. 1978 में बदरीनाथ से दिल्ली वोट क्लब तक पैदल यात्रा निकाली गई. राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपते हुए 19 मह‍िलाओं सहित 71 को तिहाड़ जेल भेज दिया गया. 1979 में 31 जनवरी को दिल्ली में 15 हजार लोगों ने जुलूस निकाला.

उत्तराखंड क्रांति दल का उदय:
24-25 जुलाई को मसूरी में पर्वतीय जन विकास सम्मेलन हुआ. इसी सम्मेलन से उपजा राज्य का पहला दल- उत्तराखंड क्रांति दल. इसके बाद लगातार उक्रांद और अन्य संगठनों ने आंदोलन किए. कई बार आंदोलनकारियों ने संसद में नारे भी लगाए. इसी बीच 1994 में खटीमा गोलीकांड हुआ. पुलिस ने जुलूस पर गोलीबारी कर दी. 2 सितंबर को मसूरी गोलीकांड हुआ. 2 अक्टूबर, 1994 को रामपुर तिराहा की वो शर्मनाक घटना हुई. जहां दिल्ली जा रहे आंदोलनकारियों पर यूपी पुलिस ने कहर ढाया और महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार किया.

1990 के बाद उग्र हुआ आंदोलन
1990 के बाद पृथक राज्य की आग भड़क चुकी थी. पुलिस की तरफ से गोलीबारी किए जाने से कई लोग शहीद हो गए. अंतत: इस 185 साल पुराने संघर्ष और शहीदों के बल‍िदान ने रंग दिखाना शुरू किया. 15 अगस्त, 1996 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा ने उत्तराखंड राज्य बनाने की घोषणा की. 1998 में अटर बिहारी बाजपेयी की सरकार ने उत्तराखंड के इस प्रस्ताव को आगे बढ़ाया.

इस तरह 1 अगस्त, 2000 को लोकसभा में पृथक उत्तराखंड राज्य का प्रस्ताव पास हुआ. 10 अगस्त को राज्यसभा ने भी हरी झंडी दिखाई. 15 अगस्त को तत्कालीन पीएम अटल ने लाल किले से अलग राज्य उत्तराखंड की घोषणा की. इस घोषणा के बाद पिछले 6 सालों से दिल्ली में चल रहे धरने का समापन 16 अगस्त को कर दिया गया. 28 अगस्त को राष्ट्रपति ने भी इसे स्वीकार कर लिया. और इस तरह 9 नवंबर, 2000 को ‘उत्तरांचल’ राज्य बना. नित्यानंद स्वामी को यहां का पहला मुख्यमंत्री बनाया गया.

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