‘सूर्य अस्त पहाड़ी मस्त’ की शुरुआत कब और कैसे हुई?

जब भी उत्तराखंड या पहाड़ को लेकर बात होती है, तो ज्यादातर लोग यहां की खूबसूरती का बखान करते हैं. यहां के लोगों के भोलेपन और ईमानदारी की तारीफ करते हैं. पर एक चीज बोलना वो नहीं भूलते.- ”सूर्य अस्त-पहाड़ी मस्त.’ सिर्फ गैर-उत्तराखंडी ही नहीं, बल्क‍ि खुद पहाड़ के लोग इस बानगी का इस्तेमाल करते रहते हैं. और इसकी वजह है पहाड़ में फैला नशा.

लेकिन अगर ये कहा जाए कि उत्तराखंड कभी वो जगह थी, जहां लोगों को शराब या दारू का नाम तक नहीं पता था. तो आप क्या कहेंगे? ये सच है. ‘सूर्य अस्त-पहाड़ी मस्त’ की शुरुआत ज्यादा पुरानी नहीं है.

कैसे फेमस हुआ ‘सूर्य अस्त-पहाड़ी मस्त’
कुछ साल पीछे जाएं, तो पहाड़ की जीवनशैली सुबह 4 बजे शुरू होती थी और शाम के 7 बजे तक खत्म हो जाती थी (मोबाइल और इंटरनेट आने के बाद यह जीवनशैली बदली है.) इसके बाद का जो भी समय होता था. वह कुछ लोग अपने परिवार के साथ बिताते. लेकिन कुछ पुरुष और जवान लड़के दिन भर की द‍िहाड़ी करने के बाद शाम को साथ बैठते और एक-एक पैग लगाते.

कई लोगों की जीवनशैली का यह एक अभ‍िन्न ह‍िस्सा बन चुका था. खुद सरकार के कुछ प्रयासों ने उत्तराखंड में शराब को बढ़ावा दिया. इतना ज्यादा कि महिलाओं को शराब बंदी करवाने के लिए सड़क पर उतरना पड़ा. पहाड़ की इस जीवनशैली के चलते ही ‘सूर्य अस्त पहाड़ी मस्त’ की बानगी फेमस हुई. क्योंकि शराब के पैग दिनभर की कमर तोड़ मेहनत और सूर्य अस्त होने के बाद ही लग पाते थे.

ऐसे हुई शुरुआत:
लेकिन हमेशा ऐसा नहीं था. 1861 में तत्कालीन कुमाऊं के सीनियर कम‍िश्नर गाइल्स ने आबकारी प्रशासन को एक रिपोर्ट सौंपी. इसमें उन्होंने पहाड़‍ियों अथवा उत्तराखंड के लोगों का जिक्र किया. इस रिपोर्ट में उन्होंने लिखा, ”पर्वतीय लोग नशे की आदत से मुक्त हैं.” हालांकि उन्होंने अपनी रिपोर्ट में एक विशेष तरल का जिक्र जरूर किया, जो यहां की जनजातियां इस्तेमाल करती थीं. लेकिन ये शराब कतई नहीं थी.

जब पता भी नहीं था कि क्या होती है शराब
दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1940-50 के दशक तक पहाड़ के किसी भी परिवार में कोई शराब पीने वाला नहीं था. कई ऐसी रिपोर्ट्स उस समय की मिलती हैं, जिनमें इसका जिक्र है कि यहां कोई नशा नहीं करता. लेकिन 60 का दशक आते-आते ये चीजें बदलने लगीं. रिपोर्ट के मुताबिक 60 के दशक में गढ़वाल और कुमाऊं मंडलों में शराब का प्रचलन बढ़ने लगा था.

दरांती लेकर सड़कों पर उतरी मह‍िलाएं
यह इतना ज्यादा हो गया कि महिलाओं ने इसका विरोध किया. वे दरांती लेकर सड़कों पर उतर आईं. श्रीनगर, पौड़ी और टिहरी में जोरदार आंदोलन हुआ. इस दौरान तत्कालीन सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए स्कूली बच्चों और मह‍िलाओं को टिहरी व सहारनपुर की जेलों में ठूंस दिया.

ट‍िंचरी माई अथवा दीपा देवी ने 60 के दशक में एक ट‍िंचरी को आग लगा दी थी. उनके इस साहसिक कदम के बाद ही मह‍िलाएं सड़क पर उतरीं और पहाड़ में शराब का रोग फैलाने का विरोध करने लगीं.

लेक‍िन इस दौरान सरकार की नीतियों ने ही पहाड़ में शराब को बढ़ावा दिया. इसी का परिणाम हुआ कि आज उत्तराखंड में शादी-बारातों का आयोजन बिना शराब के कर पाना असंभव सा माना जाता है. पहाड़ को इस शराब की लत ने काफी पीछे खींच दिया.

शराब आज भी पहाड़ को चूस रही है. और मह‍िलाएं आज भी इसके ख‍िलाफ मुखर हैं. सरकार की नीतिया शराब समर्थ‍ित ही है. अब ये हम पर है कि हम ‘सूर्य अस्त-पहाड़ी’ मस्त की परिभाषा यही रखना चाहते हैं या फिर इसे बदलकर दुनिया को दिखा दें कि उत्तराखंड देवों की धरती है. यहां गंगा-यमुना बहती है ना कि शराब की नदियां.

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