इस उत्तराखंडी की ये फिल्म आपको डरा देगी, फिर भी देखें जरूर

”यह बहुत डरावना है. इतना डर तो एक हॉरर फिल्म को देखकर भी नहीं लगता”

ये शब्द हैं एक पाकिस्तानी नागरिक के. उसका यह र‍िएक्शन ‘पीहू फिल्म का ट्रेलर देखने के बाद सामने आया है. यह कोई हॉरर फिल्म नहीं है, लेकिन फिर भी ये आपके रोंगटे खड़े कर देती है.

आप ट्रेलर देखेंगे, तो इसमें दो साल की एक प्यारी सी बच्ची नजर आती है. एकदम अकेले. मनमर्जी से काम करती है. गैस जलाती है. खुद को फ्रिज में बंद कर देती है. और तो और बालकनी पर लगी रेलिंग पर चढ़ने लग जाती है. इसी दौरान फिसलता है उसका पैर और रूक जाती हैं आपकी सांसें.

एक पाक‍िस्तानी युवती ने इस ट्रेलर को देखकर लिखा:

”मेरा कई बार मन हुआ कि वहां जाकर उस बच्ची को बचा लूं. अंत में वो जिस तरह से डॉल लेकर बालकनी पे खड़ी होती है और उसका डॉल नीचे गिर जाता है यह सब देखकर तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. मुझे इस फ़िल्म का इंतज़ार है.’

पीहू फिल्म है ही कुछ ऐसी. सिर्फ पाकिस्तानी ही नहीं, बल्क‍ि पूरी दुनिया को ये फिल्म भा रही है. यह फिल्म दुनिया के कई प्रसिद्ध फिल्म समारोहों में अवॉर्ड हासिल कर चुकी है. इसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड के लिए भेजे जाने की तैयारी भी हो रही है. इसी साल 16 नवंबर को र‍िलीज हुई इस इस फिल्म के ट्रेलर ने एक नई बहस को भी जन्म दिया है.

इस फिल्म को उत्तराखंड के विनोद कापड़ी ने बनाया है. ये वही शख्स हैं, जिन्होंने इस फिल्म की कहानी को बुना है. इसे निर्देश‍ित भी किया है. नेशनल अवॉर्ड जीत चुके और लंबे समय तक पत्रकार रहे विनोद कापड़ी प‍िथौरागढ़ से वास्ता रखते हैं. उनके पिता सेना में थे. इसीलिए उनका एक ठ‍िकाना नहीं रहा. विनोद का जन्म भी आंध्र प्रदेश के सिकंदराबाद में हुआ.

फिल्मी दुनिया में कदम रखने से पहले वह एक पत्रकार थे. उन्होंने 20 साल की उम्र में अपना करियर शुरू किया और तकरीबन 23 साल तक पत्रकारिता के क्षेत्र में रहे. इस दौरान उन्होंने दैनिक जागरण, अमर उजाला, जी न्यूज और इंडिया टीवी समेत कई चैनलों में काम किया. वह डॉक्यूमेंट्रीज बनाया करते थे.

विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पीहू’ एक सोशल थ्रीलर है. उनकी पहली फ‍िल्म मिस टनकपुर हाजिर हो, भी एक सोशल सटायर थी. वह ‘कांट टेक दिस श‍िट एनीमोर’ के लिए नेशनल अवॉर्ड भी जीत चुके हैं.

यह फिल्म स‍िकुड़ते परिवारों की कहानी बयां करती है. आधुनिकता और शहरी जीवन की तरफ बढ़ रहे लोगों को संयुक्त परिवार में रहना पसंद नहीं आता. विनोद कापड़ी की यह फिल्म इसी नई अवधारणा पर तंज कसती है. यह उस कल्पना में आपको ले जाती है, जहां एक बच्ची बिना माता-पिता के सहयोग के कमरे में बंद हो जाती है. इसकी कल्पना करने भर से मां-बाप की रूह कांप जाती है. लेकिन विनोद कापड़ी ने अपने कौशल से इसे सुनहरे परदे पर उकेरा है.

विनोद ने यह फिल्म तब बनाई थी, जब पीहू यानी मायरा विश्वकर्मा महज 2 साल की थीं. फिल्मीबीट को दिए एक इंटरव्यू में कापड़ी ने बताया कि उन्होंने मायरा से एक्टिंग नहीं करवाई, बल्क‍ि उस बच्ची के हावभाव के आधार पर ही इस कहानी को सुनहरे परदे का रूप दिया. और हां. यह फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है.

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