केदारनाथः इस फिल्म को देखने के लिए पैसे बरबाद न करें, ये हैं 5 कारण

लव जिहाद के मामले में फंस चुकी फिल्म केदारनाथ रिलीज हो चुकी है. हमने भी ये फिल्म देखी. एक उत्तराखंडी होने के नाते हमारा सुझाव यही है कि इस फिल्म को देखने के लिए अपने पैसे बरबाद न करें. केदारनाथ आपदा के नाम पर कुछ और परोसा गया है. लेकिन उसकी सजावट भी फिल्म बनाने वाले ठीक से नहीं कर पाए. 

आगे हम आपको बता रहे हैं 5 ऐसी वजहें, जिनके चलते आपको इस फिल्म से निराशा ही हाथ लगेगी. इसलिए जो 200-300 रुपये आप इस फिल्म पर खर्च करने की सोच रहे हैं, उन्हें संभाल लें. बरबाद न करें. 

केदारनाथ आपदा के नाम पर परोसी सस्ती कहानीः
सुशांत सिंह राजपूत और सारा अली खान के अभिनय वाली इस फिल्म पर लव ज़िहाद का आरोप पहले ही लग चुका है. लेकिन जब आप फिल्म देखते हैं, तो आपको महसूस हो जाता है कि इसमें केदारनाथ आपदा के नाम पर  एक सस्ती प्रेम कहानी परोसने की कोशिश की गई है.

फिल्म का नाम केदारनाथ भ्रमाने के लिए रखा गया
जब आप फिल्म देखने थियेटर में जाते हैं, तो आप ये सोचकर जाते हैं कि फिल्म में केदारनाथ आपदा का भयानक मंजर दिखाया जाएगा. लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, आपकी ये अपेक्षा मरती जाती है. फिल्म में केदारनाथ आपदा इंटरवल के बाद दिखाई गई है. इसमें भी आपदा के बीच नायक-नायिका के प्रेम को ही तवज्जो दी गई है. इससे केदारनाथ आपदा की पीड़ा की अहमियत खत्म कर दी जाती है. 

ऐसा लगता है मानो जैसे केदारनाथ नाम सिर्फ दर्शकों को थियेटर में बुलाने के लिए रखा गया है. इस फिल्म का नाम केदारनाथ किसी भी हाल में नहीं होना चाहिए था. क्योंकि फिल्म एक प्रेम कहानी है, जिसका केदारनाथ आपदा और उसके पीड़ितों से कोई वास्ता नहीं है. 

उत्तराखंड की फिल्म में उत्तराखंड नहीं:
यह फिल्म केदारनाथ आपदा की पृष्ठभूमि पर बनी है. मतलब उत्तराखंड का परिवेश है. ऐसे में एक उम्मीद आपकी ये भी रहती है कि फिल्म में आपको उत्तराखंडी भाषाएं सुनाई देंगी. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं होता. फिल्म का मुख्य कलाकार मंसूर भोजपुरी और गुजराती तो बोल भी लेता है, लेकिन उसके मुंह से एक शब्द भी आप उत्तराखंडी भाषा का नहीं सुनते. 

मांगल गीत का मजाक बना दियाः
दूसरी तरफ, एक शादी के दौरान ‘‘दैणा हुयां‘‘ मांगल गीत को पेश किया गया है. लेकिन इस गीत को जिस तरह पेश किया गया है, वह इसकी बेइज्जती करने से ज्यादा कुछ नहीं है. बेसुरे ढंग से और सिर्फ खानापूर्ति के लिए इस गीत को फिल्म में ठूंसा गया है. एक उत्तराखंडी होने के नाते आपको ये रवैया देखकर बुरा लगता है.

कमजोर कहानी को ढोते डेढ़ घंटे
फिल्म महज डेढ़ घंटे की है, लेकिन कहानी कमजोर है. ये फिल्म केदारनाथ आपदा का सहारा लेकर हिट होने की उम्मीद रखती है. लेकिन ऐसा करने में यह पूरी तरह नाकामयाब साबित होती है.

क्या है अच्छा
इस फिल्म में केदारनाथ घाटी की खूबसूरत वादियों का सजीव चित्रण है. इन वादियों को देखकर आप प्राकृतिक खूबसूरती में खो जाते हैं. केदारनाथ आपदा का अगर आप आर्टिफिशियल स्वरूप देखना चाहते हैं, तो इसके लिए फिल्म देखनी की सोची जा सकती है. 

छिबड़ाट इस फिल्म को 1 स्टार देता है. क्योंकि इस फिल्म में केदारनाथ आपदा को हिट होने के लिए भुनाने की एक नाकामयाब कोशिश दिखती है.   

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