टिंचरी माई: अनपढ़ ‘गंवार’ महिला, जिसकी बात नेहरू को भी माननी पड़ी

महज 2 साल की उम्र में मां का आंचल छूट गया. 5 वर्ष की आयु में पिता का साया भी उठ गया. और सिर्फ 19 वर्ष की उम्र में उसका जीवनसाथी भी उसे छोड़कर इस दुनिया से चला गया. वो पैदा हुई थी दीपा देवी के तौर पर. हालात ने उसे इच्छागिरी माई बना दिया. लेक‍िन उसके साहस ने उसे ‘टिंचरी माई’ नाम दिया. और आज भी उत्तराखंड में वह इस नाम से जानी जाती हैं. याद की जाती हैं.

पति चला गया, तो सबने ठुकरायाः
पौड़ी के थलीसैंण ब्लॉक में मंज्यूर की टिंचरी माई को पहाड़ में शराब के ख‍िलाफ अभ‍ियान चलाए जाने के लिए जाना जाता है. इस निर्भीक औरत ने तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को भी अपनी मांग मनवाने के लिए मजबूर किया था. महज सात साल की उम्र में माई का विवाह गवांणी गांव के गणेश राम से हुआ. शादी के तुरंत बाद वह पति के साथ रावलपिंडी चली गईं. गणेश राम लड़ाई पर गए लेकिन लौट कर नहीं आए. उनके शहीद होने के बाद एक अंग्रेज अफसर ने माई को उनकी ससुराल पहुंचा दिया. लेक‍िन उनकी ससुराल ने उनका तिरस्कार कर दिया. उन्हें अपमानित कर घर से निकाल दिया.

जब नेहरू से माई ने मनवाई अपनी बात
माई निर्भीक थीं. उन्होंने हार नहीं मानी और वह यहां से लाहौर चली गईं. लाहौर में वह एक मंदिर में रहने लगीं. उन्होंने यहां संन्यासिन की दीक्षा ली. 1947 में जब सांप्रदाय‍िक दंगे भड़के, तो वह हर‍िद्वार आ गईं. यहां से वह फिर सिगड्डी भाबर आईं. घास-फूस की एक झोपड़ी बनाकर यहां रहने लगीं. यहां पानी का बड़ा अभाव था. माई ने पानी लाने के लिए संघर्ष करना शुरू कर दिया. वह अध‍िकारियों से मिलीं, लेक‍िन कुछ नहीं हुआ. आख‍िर में उन्होंने दिल्ली जाकर जवाहर लाल नेहरू से पानी मांगने की ठानी.

उन्होंने यही किया. वह दिल्ली पहुंचीं और नेहरू की कोठी के फाटक पर धरना देने बैठ गईं. नेहरू की गाड़ी आते हुए देख वह उसके सामने खड़ी हो गईं. नेहरू गाड़ी से उतरे और माई ने सीधे उन पर सवाल दाग दिया- ‘बोल पानी देगा या नहीं?’ नेहरू ने बुखार से तप रही माई की पूरी बात सुनी और उन्हें अस्पताल में भर्ती कर दिया. अस्पताल से जब माईं लौट रही थीं. तो नेहरू ने उन्हें कुछ कपड़े देते हुए कहा- ”अब जाओ जल्दी. पानी मिल जाएगा.” और इस तरह गांव में पानी पहुंचा.

जब टिंचरी को लगा दी आग…
बात 1955-56 के आसपास की है. एक दिन माई डाकखाने के बरामदे में बैठी हुई थीं. सामने एक शराबी व्यापारी की टिंचरी की दुकान थी. वहां से एक शराबी निकला और एक मह‍िला को अश्लील नजर से देखने लगा. यह सब देखकर माई को बहुत गुस्सा आया. वह सीधे कडोलिया डिप्टी कमिश्नर के बंगले जा पहुंची. जब माई उनके बंगले पर पहुंची, तो कमि‍श्नर कुछ ल‍िख रहे थे. लेक‍िन माई ने आव देखा न ताव. सीधा उनका हाथ पकड़ लिया और कहा, ”तू यहां बैठा है. चल मेरे साथ. देख तेरे राज में क्या हो रहा है?”

कमिश्नर माई के साथ वहां पहुंचे. लेक‍िन कमिश्नर को शांत देखकर माई का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. उन्होंने कम‍िश्नर से कहा, ” देख लिया तुमने. ठीक तुम्हारी नाक के नीचे क्या हो रहा है? लेक‍िन तुम कुछ नहीं कर पाओगे. लेक‍िन मैं और तमाशा नहीं होने दूंगी. आग लगा दूंगी इस दुकान पर. तुम मुझे जेल भेज देना. मैं जान दे दूंगी लेक‍िन टिंचरी नहीं बिकने दूंगी.

कमिश्नर चले गए. लेकिन माई नहीं. माई ने कहीं से मिट्टी का तेल लाया. माचिस की डिबिया लाई और बंद दरवाजा तोड़कर अंदर घुस गईं. उन्हें देखकर वहां शराब पी रहे लोग भाग खड़े हुए. और माई ने पलभर में दुकान को आग लगा दी. कुछ वक्त में ही दुकान स्वाहा हो गई.

दुकान को आग लगाने के बाद वह कम‍िश्नर के पास पहुंचीं और कहा- ”दुकान फूंक आई हूं. अब मुझे जेल भेजना है, तो भेज”. कम‍िश्नर उन्हें लैंसडोन ले गए. अब तक यह खबर पूरे पहाड़ में फैल चुकी थी. उनके इस साहस की बदौलत अन्य मह‍िलाओं ने भी रास्तों पर उतरना शुरू कर दिया. और इस तरह पहाड़ में शराब के ख‍िलाफ व्यापक अभ‍ियान की शुरुआत हुई.

बालिकाओं की शिक्षा के लिए किया काम
माई के पास भले ही कभी धन न रहा हो, लेकिन उन्होंने अपने दम पर एक स्कूल भी खड़ा किया. प्रशासन स्कूल बनाने की सोचता रहा और माई ने कर के दिखा दिया. उन्होंने भले ही कभी किताब नहीं देखी होगी लेकिन उन्होंने बालिकाओं की श‍िक्षा की खातिर काफी कुछ किया. टिंचरी माई का निधन 75 साल की उम्र में १९९२ में हो गया.

उत्तराखंड में टिंचरी माई जैसी अनगिनत मह‍िलाएं हैं, जिन्होंने समाज की कुरीतियों के ख‍िलाफ आवाज उठाई और दूसरों में भी अल जगाई. टिंचरी माई को हमारा कोट‍ि-कोट‍ि नमन.

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