…पलायन बेचारा जीत गया

यह कविता सोशल मीडिया से ली गई है। हम इसके लेखक का नाम तो नहीं जानते पर ये कविता सच बयां करती है।…

अटठारह साल का उत्तराखंड
कुछ इस तरह से बीत गया!
सत्ता की दौड़ में कभी कमल
तो कभी हाथ ही जीत गया!!

महफूज़ थे जो खेत खलिहान
उन सबको बंजर कर गया!
पुश्तैनी मकानों की नींव को
पलायन से जर्जर कर गया!!

पहाडों की रौनक और खुशियां
गांवों को सुनसान कर गया!
विकास भी पहाडों में आने से
धरातल पर सचमुच डर गया!!

राज्य बनाया जिस मकसद से
वो सपनों मे ही रीझ गया!
विकास की दौड़ में पहाडों में
पलायन बेचारा जीत गया!!

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