ढोल-दमो बजाने वाले प्रीतम भरतवाण कैसे बने ‘जागर सम्राट’?

भारत सरकार ने उत्तराखंड की तीन हस्तियों को पद्म पुरस्कार से नवाजा है। ये हैं पर्वतारोहिणी बछेंद्री पाल, फोटोग्राफर अनूप शाह और जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण। माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली बछेंद्री पाल को पद्मभूषण दिए जाने की घोषणा की गई है। बछेंद्री पाल मूलतः उत्तरकाशी की रहने वाली हैं और वो आज भी पर्वतारोहण व समाज की खातिर काम कर रही हैं। 

अनूप शाह और प्रीतम भरतवाण को पद्मश्री से नवाजा गया है। अनूप शाह मूलतः नैनीताल के रहने वाले हैं। वह न सिर्फ एक फोटोग्राफर हैं, बल्कि एक पर्वतारोही और लेखक भी हैं। उन्होंने हिमालय के अंचल को अलग-अलग रूप में अपने कैमरे में कैद किया है।

प्रीतम भरतवाण

प्रीतम भरतवाण

प्रीतम को पद्मश्री से नवाजा जाना न सिर्फ प्रीतम दा के कार्य को सराहना है, बल्कि ये उस तबके का सम्मान भी है, जिस तबके से प्रीतम आते हैं। 

प्रीतम भरतवाण। ये उस शख्स का नाम है, जिसने उत्तराखंड के परंपरागत जागरों और गीतों को दुनिया के हर कोने तक पहुंचाया है। आज अगर युवा पीढ़ी के बीच जागरों को लेकर क्रेज है, तो उसका पूरा श्रेय प्रीतम दा को जाता है।

प्रीतम भरतवाण को पद्मश्री से नवाजा गया है

प्रीतम भरतवाण को पद्मश्री से नवाजा गया है

नेगी दा यानी नरेंद सिंह नेगी जी ने अपने गीतों से उत्तराखंड की पीढ़ा को पेश किया है। तो वहीं प्रीतम दा ने यहां की संस्कृति और देवभूमि की परंपराओं को सहेजने का काम किया है और इसे दुनिया तक पहुंचाया है। 

प्रीतम भरतवाण हमारे समाज के उस तबके से आते हैं, जिसे अक्सर हम अपने बराबर नहीं समझते. लेकिन प्रीतम दा ने इस विचारधारा को बदलने में अहम भूमिका निभाई है। 

5 साल की उम्र से ढोल-दमो से दोस्ती
प्रीतम भरतवाण का जन्म देहरादून के रायपुर ब्लॉक स्थित सिला गांव में एक औजी परिवार में हुआ. महज ५ साल की उम्र में उन्होंने ढोल-दमो से गहरी दोस्ती कर ली थी। १९८८ में उन्होंने आकाशवाणी के लिए गाना शुरू किया। इसके ठीक चार साल बाद उन्होंने रंगीली बौजी एल्बम लाया और फिर सिलसिला चल पड़ा.

प्रीतम भरतवाण ने ढोल-दमो की संस्कृति को बचाने के लिए काम किया है

प्रीतम भरतवाण ने ढोल-दमो की संस्कृति को बचाने के लिए काम किया है

विदेशियों को सिखा चुके हैं ढोल-दमो
वह अमेरिका की सिनसिनाइटी यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर के तौर पर जा चुके हैं। उन्होंने यहां विदेशी छात्रों को ढोल दमाे वादन सिखाया। इसी तरह उन्होंने देश-विदेश में ढोल-दमो की विधा को पहुंचाया है। 

प्रीतम दा की हमेशा ये खासियत रही है कि उनके हर एल्बम में कम से कम एक जागर जरूर होता है। ५० से ज्यादा एलबमों में प्रीतम ३५० से ज्यादा गीत गा चुके हैं।

अमेरिका में विदेशी छात्रों को ढोल-दमो बजाना सिखाते हुए

अमेरिका में विदेशी छात्रों को ढोल-दमो बजाना सिखाते हुए

प्रीतम दा को सिर्फ इसलिए नहीं सराहा जाना चाहिए कि वे जागरों को गा रहे हैं, बल्कि इसलिए भी सराहा जाना चाहिए कि वे जागरों और ढोल-दमों के संरक्षण के लिए भी काम कर रहे हैं।

वह नई पीढ़ी को प्रशिक्षित भी कर रहे हैं। और इसीलिए वे जागर सम्राट हैं. प्रीतम भरतवाण इस सम्मान के सच्चे हकदार हैं। उनके योगदान के लिए हर उत्तराखंडी उनका आभारी होगा। 

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