ऊंची जाति वालों… छोटी जाति वालों के बिना तुम कुछ भी नहीं कर पाते

टिहरी गढ़वाल जिले ने नैनबाग इलाके में एक दलित युवक को सिर्फ इसलिए मौत के घाट उतार दिया गया, क्योंकि उसने ऊंची जाति वालों के सामने खाना खाया था। २३ वर्षीय जितेंद्र की सिर्फ इतनी गलती थी कि वह ऊंची जाति वालों के सामने कुर्सी पर बैठा और खाना खाने लगा। जितेंद्र को इतना बड़ा ‘गुनाह’ करने की सजा पीट-पीटकर दी गई।

सिर्फ जितेंद्र ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड में हर दलित के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है। आजतक तसल्ली होती थी कि हमारे उत्तराखंड में दलितों का सम्मान किया जाता है। भले ही उनसे भेदभाव रखा जाता है, लेकिन उन्हें सम्मान की नजरों से देखा जाता है। लेकिन ऐसी घटनाएं भी देवों की भूमि कही जाने वाली इस भूमि में होती रहती है।

खुद को ऊंची जाति के कहने वाले ये तथाकथित लोग ये क्यों भूल जाते हैं कि अगर दलित न होते, तो शायद इनके कई काम संभव ही नहीं हो पाते।

नहीं कर पाते शादी
इन ऊंची जाति के ठेकेदारों के घऱ में शादी दलितों के बिना संभव नहीं होती। क्योंकि शादी में ढोल-दमो बजाने वाले औजी दलित ही होते हैं। अगर औजी ढोल-दमो बजाने से इनकार कर दे, तो इनके यहां शादी न हो। क्योंकि ढोल-दमो बजाना भी ये लोग अपनी शान के खिलाफ समझते हैं। इनके मुताबिक ये काम दलित जाति का है।

खाना कैसे खाते?

कोई छोटी जाति का व्यक्ति जब इनके घर आता है, तो ये उसे जिस गिलास में पानी दिया जाएगा, उसे घर के सभी बर्तनों से अलग रखा जाता है। बाद में उस पर गंगा जल छिड़कने के बाद ही घऱ में लिया जाता है। लेकिन ये ऊंची जाति वाले इस समय भूल जाते हैं कि उनके घर में इस्तेमाल होने वाली कांस की थाली भी यही लोग (कारीगर) बनाते हैं। ज्यादातर बर्तन इन्हीं के हाथों से बनकर आते हैं। तब इन्हें छुआछूत नहीं दिखता।

घास कैसे काटते?

उत्तराखंड में आज भी घास काटने और अन्य काम के लिए इस्तेमाल होने वाली दाथुड़ी व अन्य औजार भी लोहार बनाते हैं। ऊंची जाति वालों को ये काम ना के बराबर आता है। क्योंकि ये काम इन ऊंची जाति वालों के मुताबिक उनकी प्रतिष्ठा के खिलाफ है। समझ ये नहीं आता कि जब दलित से छुआछूत ही करनी है, तो दाथुड़ी जैसे ओजारों का इस्तेमाल क्यों करते हैं?

अपने देवी-देवता कैसे बुला पाते?

खुद को ऊंची जाति का बताने वाले ये लोग दलितों की मदद के बिना अपने देवताओं को भी नही बुला पाते। जब भी इन्हें देवी-देवताओं के दर्शन करने होते हैं। इन्हें ओजी की जरूरत पड़ती है। ओजी के जागरों से ही इनके देवता जागते हैं।

अब ये समझ नहीं आता कि जिनके देवता भी उनकी मर्जी से अवतरित नहीं होते, वे लोग खुद को बड़ा बताते हैं। और जिनके बुलाने पर इनके देवता अवतरित होेते हैं, वे न जाने कैसे छोटी जाति के हो गए।

ऐसे ही अन्य कई अनगिनत काम हैं, जो इन छोटी जातियों वालों के बिना नहीं हो सकते। इन ऊंची जाति वालों को इन छोटी जाति वालों के सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। छोटी जातियां अगर हड़ताल कर दें, तो इन बड़ी जाति वालों के कई काम अटक जाएं। लेकिन इतना सब होने के बाद भी ये ऊंची जाति वाले घमंड पाले हुए हैं कि ये बड़े हैं।

दुख तो इस बात का होता है कि जिस उत्तराखंड को देवभूमि का नाम दिया जाता है। वहां इंसानों को इंसान नहीं समझा जा रहा। देश और दुनिया में उत्तराखंड के लोगों को सबसे शांत और ईमानदार माना जाता है, लेकिन टिहरी की इस तरह की कुछ घटनाएं पूरे उत्तराखंड को बदनाम करती हैं।

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