लूण लोटा: इस प्रथा के बाद कोई वचन तोड़ने की हिम्मत नहीं करता

एक शख्स हाथ में पानी से भरे लौटे को पकड़ता है। दूसरे हाथ से उसमें नमक डालता है। इस दौरान वह अपने मुंह से एक वादा अथवा वचन देता है, जिसे पूरा करने की वो कसम खाता है। लौटे में नमक डालने के बाद वो किसी भी सूरत में अपने वचन को पूरा करने से पीछे नहीं हट सकता।… जी हां. यही प्रथा कहलाती है- लूण लौटा। हिमाचल प्रदेश के कई भागों में यह प्रथा आज भी प्रचलित है। लूण लौटा में लूण यानी नमक होता है।

क्या है यह प्रथा?

उत्तराखंड की तरह ही हिमाचल प्रदेश में भी देवताओं का वास है। पहाड़ के भोले-भाले लोगों की देवी-देवताओं में अटूट आस्था है। इसी आस्था से निकली है- लूण लौटा की प्रथा। हिमालच प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में आज भी ये प्रथा मौजूद है। शिमला और सिरमौर के आंतरिक इलाकों में इसे ‘लूण लोटा’ कहा जाता है. इस प्रथा में देवी-देवाताओं के नाम पर कसम खिलाई जाती है। ये देवी-देवता गांव के इष्ट होते हैं।

लूण लौटा के बाद वचन क्यों नहीं तोड़ते?

जैसे कि हमने शुरुआत में बताया कि लौटे में नमक डालकर कसम खिलाई जाती है। बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस प्रथा का ज्यादातर इस्तेमाल पंचायती चुनाव में देखने को मिलता है। दरअसल जब एक शख्स पानी से भरे लौटे में नमक डालते हुए कसम लेता है, तो वह एक वादा कर रहा होता, जिसे उसे निभाना ही होगा। अगर उसने नहीं निभाया तो जिस तर पानी में नमक घुल गया और खत्म हो गया। उसी तरह अगर वचन अथवा वादा पूरा नहीं किया तो वचन देने वाल शख्स भी इसी तरह खत्म हो जाएगा।   

सिर्फ लूण लौटा नहीं, ये भी हैं तरीके

ऐसा नहीं है कि हिमाचल में सिर्फ लूण लौटा की ही प्रथा है। लूण लौटा के अलावा कई और तरीके हैं, जिनके जरिये एक शख्स को कसम खिलवाई जाती है। जहां सिरमौर और शिमला में लूण लोटा की परंपरा है। वहीं, मंडी, कुल्लू जैसी जगहों मंदिर के सामने पानी पिलाने और चावल देने की प्रथा है। लाहौल-स्पीति की तरफ बढ़ेंगे तो यहां पर बौद्ध और हिंदू परंपराओं का समायोजन दिखता है। ऐसे में यहां पर जाप के लिए इस्तेमाल की जाने वाली माला के माध्य से कसम दिलाई जाती है।

कसमी नारायण
कुल्लू क्षेत्र में इस काम के लिए एक खास देवता हैं। जिन्हें कश्यप नारायण कहा जाता है। स्थानीय भाषा में इन्हें कसमी नारायण बुलाया जाता है। आज भी लोग नारायण देवता के सामने झूठी कसम खाने से डरते हैं। लोग डरते हैं कि अगर उन्होंने कसमी नारायण की झूठी कसम खाई, तो उन पर देवता का प्रकोप होगा और उनके जीवन में उथल-पुथल हो जाएगी। 

क्यों और कैसे शुरू हुई ये प्रथाएं?

पहाड़ी राज्य हिमाचल और उत्तराखंड के लोगों की सिर्फ संस्कृति में बहुत सी चीजें एक जैसी हैं। और इनमें देवताओं पर अटूट विश्वास की परंपरा भी है। पहाड़ी राज्यों में आज भी कई ऐसे लोग हैं, जो अपने गांव से बाहर नहीं निकले हैं। उनके लिए ये देवता ही सर्वोपरि हैं।

इन प्रथाओं की जब शुरुआत हुई थी, तब इनका इस्तेमा विवादों का निपटारा करने के लिए किया गया। विवादों को सुलझाने का यह एक शांतिपूर्ण तरीका था। पर जैसे-जैसे वक्त बदला, लोगों ने इसका गलत इस्तेमाल भी करना शुरू कर दिया। चुनावों में सबसे ज्यादा इसका गलत इस्तेमाल होता है। लूण लोटा करवाकर वोट पक्के किए जाते हैं।

देवी-देवताओं में हम पहाड़ी राज्यों की आस्था का ही परिणाम है कि आज भी हम कई बुराइयों से बचे हुए हैं। लेकिन देवी-देवताओं में हमारे विश्वास का गलत इस्तेमाल करने वाले लोगों को भी आइना दिखाना जरूरी है।

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