​हिमाचल प्रदेश में खेतों में क्यों खड़ी हो रही हैं सैकड़ों कारें?

खेतों में खड़ी कारें (Photo: BBC)

ये तस्वीर शिमला की ओर जाते हुए रास्ते की है। यहां आपको कई खेतों में ऐसे नवी-नवेली कारें और अन्य गाड़ियां खड़ी दिखाई देंगी। दूर से आप देखते हैं तो लगता है जैसे कि इन पहाड़ियों पर बसे गांवों के किसान काफी अमीर हैं। लेकिन जब आप गांव में पहुंचते हैं तो इस अमीरी का दर्शन देने वाली तस्वीर के पीछे का दुखद सच सामने आता है। एक ऐसा सच, जिससे सिर्फ हिमाचल ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड भी जूझ रहा है।

जिन खेतों में आपको ये कारें और अन्य वाहन खड़े दिखाई देते हैं। वे कभी हरे-भरे खेत थे। इनमें फसलें लहलहाया करती थीं, लेकिन कुछ वक्त से यहां सिर्फ सैकड़ों गाड़ियां खड़ी दिखती हैं। शिमला से मात्र 25 किलोमीटर की दूरी पर ये नजारा आपको नजर आता है। हम बता दें कि ये कारें न गांव वालों की हैं और ना ही किसी अमीर शख्स की। ये सभी कारें कार बेचने वाले शोरूम की हैं।  

ऐसे में सवाल उठता है कि आख़िर वो क्या वजह थी जिसके चलते किसान अपनी ज़मीनों पर फसल उगाने की जगह कारें खड़ी करने को तैयार हुए?

किसानों को क्या मिलता है?
बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक किसान अब हरी-भरी फसल उगाकर नहीं, बल्कि इन कारों को अपने खेतों में जगह देकर कमाई कर रहे हैं। किसानों को हर एक कार खेत में खड़ी करने के बदले 100 रुपये प्रति माह मिल जाते हैं। इस तरह किसान हर महीने आराम से 8 से 10 हजार रुपये कमा रहे हैं। वो भी खेत पर बिना कुछ मेहनत किए। 

क्या है वजह?
दरअसल हर किसान की तरह यहां के किसान भी अपने खेतों पर फसल उगाना ही पसंद करते हैं। लेकिन अपनी फसल को बचाए रखना इनके लिए बड़ी चुनौती होती है। 

दिन में बंदर इनकी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं। वहीं रात में जंगली सूअर और नील गाय फसलों का नुकसान करती हैं। इस तरह देह तोड़ मेहनत करने के बाद भी इनके हाथ फसल के नाम पर कुछ नहीं आता। किसानों का कहना है कि दिन में रखवाली कर बंदरों से तो फसल को सुरक्षित रखा जा सकता है, लेकिन रात में ऐसा कर पाना मुश्किल होता है।

कैसे हुई शुरुआत?
किसानों ने धीरे-धीरे खेती छोड़ी और एक कार का शोरूम ये प्रस्ताव लेकर इनके पास आया। ये नई नवेली गाड़ियां कुछ दिन इन खेतों में खड़ी रहती हैं। कुछ दिन बाद ये शोरूम में चली जाती हैं। इस तरह किसानों को आय होने लगी और कार शोरूम मालिकों को सस्ते में अपना काम निपटाने का मौका मिल गया। इस उपक्रम की शुरुआत 3 साल पहले हुई थी। एक गांव से हुई ये शुरुआत आज कुछ और गांवों में भी पहुंच गई है।

बंदरों से कैसे बचें?
किसानों के सामने बंदरों और जंगली सुअरों की तरफ से फसलें बरबाद किए जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। यही वजह है कि इस खतरे से बचने के लिए उन्होनें दिल पर पत्थर रखकर ये खेत कार के नाम कर दिए। आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि हर साल बंदरों और जंगली सुअरों के चलते ६५० करोड़ का नुकसान हिमाचल को होता है।

 

खैर हिमाचल सरकार भी बंदरों से निजात पाने की कोशिशि में लगी हुई है। लेकिन कोशिश कामयाब होती नहीं दिख रही है। खैर, किसानों का इस तरह अपने खेतों को कारों के लिए देना गलत हो सकता है… लेकिन उनके पास दूसरा विकल्प भी तो हो।…

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