#ShikshakPustak: सड़कों पर छात्र फिर भी क्यों मौन उत्तराखंड सरकार?

5 जुलाई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मोदी सरकार २.० का बजट पेश किया। इस दौरान जब वह शिक्षा में सुधार की बात कर रही थीं, उसी दौरान संसद से करीब 500 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ में छात्र और अभिभावक कॉलेज में लाइब्रेरी के लिए नई किताबों और पर्याप्त अध्यापकों के लिए आंदोलन कर रहे थे। 

उत्तराखंड के पिथौरागढ़ स्थित लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के छात्रों ने यह आंदोलन शुरू किया है। एक ऐसा आंदोलन, जिसकी शायद कोई कल्पना भी ना करे। क्या आपने आज तक कहीं सुना है कि कहीं छात्रों ने किताबों और शिक्षकों की खातिर आंदोलन किया हो? नहीं सुना ना। पिथौरागढ़ के इस कॉलेज के छात्रों ने पूरी दुनिया के लिए मिसाल पेश की है।

आंदोलन की एक तस्वीर

आंदोलन की एक तस्वीर

कॉलेज के बच्चे पिछले 22 दिनों से धरने पर बैठे हैं। इनकी मांग कॉलेज को हाईटेक बनाने की नहीं, बल्कि कॉलेज लाइब्रेरी में नई और जरूरी किताबों के लिए है। कॉलेज में शिक्षकों की भारी कमी है, उसे दूर करने के लिए इनकी मांग है। कॉलेज प्रशासन है कि डिगने को तैयार नहीं। कॉलेज प्रशासन लगातार यही कह रहा है कि छात्रों को ये आंदोलन नहीं करना चाहिए।

ये छात्र 17 जून से गांधीवादी तरीके से अपना आंदोलन जारी रखे हुए हैं। जिस कॉलेज के ये छात्र हैं, वह कुमाऊं विश्वविद्यालय का दूसरा सबसे बड़ा कॉलेज है। 

कॉलेज की लाइब्रेरी में रखी सिलैबस की किताबें नब्बे के दशक की हैं। इन किताबों पर भी धीमक लग चुकी हैं। बेतरतीब अवस्था में पड़ी इन किताबों को हाथ में उठाओ तो पूरी खुलकर जमीन पर गिर जाएं। छात्रों का कहना है कि उन्हें यहां से एक या दो ही पुस्तकें मिल पाती हैं।

पिथौरागढ़ आंदोलन

पिथौरागढ़ आंदोलन

आंदोलन क्षेत्र पर भी ये बच्चे अपनी पढ़ाई और कला को निखार रहे हैं। आंदोलनमें कविताओं और लेखों के जरिये, नारों के जरिये विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। सीनियर छात्र अपने जूनियर छात्रों को धरना स्थल पर पढ़ा रहे हैं।

खैर, 22 दिनों से जारी इस धरने पर NDTV के रवीश कुमार के रिपोर्ट पेश करने के बाद अन्य मीडिया संस्थानों की भी नींद खुली है। राज्य के कई मीडिया संस्थान इससे पहले पिथौरागढ़ के बच्चों के इस आंदोलन को छोटी-छोटी खबरों में समेट दे रहे थे। लेकिन अब इन्होंने थोड़ी सी जगह बढ़ानी शुरू कर दी है। 

मीडिया ने तो धीरे-धीरे ही सही जगह दे ही दी है, लेकिन ये सुप्त सरकार न जाने कब जागेगी? जिस सरकार के कानों में इतने बड़े आंदोलन की आहट नहीं पड़ रही है। 

राज्य की भाजपा सरकार की तरफ से इस आंदोलन को लेकर अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। अब देखना ये होगा कि बच्चों का ये संघर्ष कब तक जारी रहता है? और सोई हुई सरकार की आंख कब खुलती है?

तब तक आप जहां भी हैं, जैसे भी हैं. और जिस तरह से भी संभव हो सकता है। इस आंदोलन को आगे बढ़ाएं। सोशल मीडिया की इस्तेमाल सिर्फ मोदी जी या किसी अन्य राजनीतिक संगठन व नेता के के लिए ना करें। समाज की बेहतरी के लिए भी इसका इस्तेमाल करें तो बेहतर हो।

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