नइमा खान उप्रेती: पूरी जिंदगी उत्तराखंडी लोक संगीत पर न्यौछावर की

उत्तराखंडी लोकसंगीत और लोकनाट्य को पहाड़ के घाटे-बाटों से निकालकर विश्व पटल पर पहुंचाचाने में अहम भूमिका निभाई है। आज जब आप बेडु पाको बारोमासा और लाली हौेंसिया जैसे गीत गुनगुनाते हैं, तो इन गीतों को भी आप तक पहुंचाने में इनकी अहम भूमिका रही है। इनका नाम है नइमा खान उप्रेती। जी हां… नईमा खान उप्रेती। 

कौन हैं नइमा खान उप्रेती
अल्मोड़ा के कारखाना बाजार में एक समृद्ध मुस्लिम परिवार रहता था। इसी परिवार में सन 1938 में नइमा खान का जन्म हुआ। नइमा का जन्म ऐसे समय में हुआ था, जब उत्तराखंड का लोकसंगीत सिर्फ लोगों के बीच था। इसका अभी तक आधिकारिक मंचन और आधिकारिक रिकॉर्ड कहीं भी नहीं हुआ था।

नइमा खान को बचपन से ही गायन का शौक था। वह हिंदी फिल्मों के गीत गुनगनाया करती थीं।… बाद में नइमा खान के गायन का यही शौक स्कूल और कॉलेज में भी जारी रहा।… गायन के इसी शौक के जरिये उनकी मुलाकात भारतीय थियेटर म्यूजिक के प्रणेता मोहन उप्रेती से हुई।

मोहन उप्रेती के साथ आने के बाद नइमा ने उत्तराखंडी नाटकों के मंचन में भी भाग लिया। और इसी दौरान दोनों में प्रेम उपजा और दोनों ने शादी कर ली। 2018 में नइमा ने आखिरी सांस ली… लेकिन वह आखिरी सांस तक उत्तराखंडी लोकसंगीत को बढ़ावा देने में जुटी रहीं।

मोहन उप्रेती जी से पहली मुलाकात
नइमा खान की मोहन उप्रेती से मुलाकात काफी दिलचस्प रही। एक इंटरव्यू में नइमा ने खुद इसका जिक्र किया था। उन्होंने बताया था कि एक दिन उनके कॉलेज में मोहन उप्रेती जज बनकर आए थे। इस कार्यक्रम में नइमा ने भी गाना गाया। हमेशा पहले पायदान पर आने वाली नइमा को उप्रेती ने दूसरे पायदान पर चुना। नइमा इससे गुस्सा हो गईं और उन्होंने जज यानि उप्रेती की आलोचना करनी शुरू कर दी।

भले ही इनकी शुरुआत थोड़ी कड़वी रही, लेकिन आगे जाकर इन्होंने साथ मिलकर उत्तराखंडी नाटक किए। राजुला मालुशाही, रामी बौराणी, इंद्रसभा समेत कइ नाटकों को इन्होंने मंच पर प्रदर्शित किया था।… महिलाएं क्योंकि नाटक नहीं करती थीं। इसलिए नइमा सिर्फ बैकग्राउंड में गाती थीं। हालांकि बाद में उन्होंने नाटक में हिस्सा भी लिया। और अपने पति के साथ पर्वतीय नाट्य कला मंच की स्थापना भी की। दोनों के दिल में प्रेम के बीज तो पनपे लेकिन हिंदू ब्राह्मण परिवार से आने वाले उप्रेती जी के परिवार को ये रिश्ता मंजूर नहीं था। हालांकि बच्चों की जिद के आगे दोनों परिवारों को झुकना पड़ा और नइमा खान नइमा खान उप्रेती बन गईं।

मोहन उप्रेती और नइमा ने साथ मिलकर उत्तराखंडी लोकसंगीत को पूरे देशभर में पहुंचाया। नइमा ने एक इंटरव्यू में बताया कि बेडु पाको गीत मोहन उप्रेती ने लिखा नहीं है। उन्होंने कहीं ये गीत सुना था। जब उन्होंने यह गीत सुना था… तो यह काफी धीमे सुर में था।

उन्होंने इस गीत को धुनबद्ध किया और देश-दुनिया तक पहुंचाया। इसके अलावा आज जो घस्येरी गीत आप सुनते हैं, वे भी इन्हीं की वजह से हैं। क्योंकि इस जोड़ी ने घस्येरी गीतों का जगह-जगह मंचन किया। 

रामी बौराण
रामी बौराण पहले सिर्फ एक गीत था। लेकिन इस जोड़ी ने ही इसे नाट्य रूप दिया। नइमा ने १९५३ में गायन की औपचारिक शुरुआत की। 1967 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग की शिक्षा ली। 1973 में नइमा दूरदर्शन से जुड़ीं। देश में जो सबसे पहला कलर शो चला था, उसका हिस्सा भी नइमा रही हैं। 

महान इंसान का दर्जा हासिल किया
नइमा चाहती तो बॉलीवुड में एक्टिंग या गायन कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक उत्तराखंड लोकनाट्य को बढ़ाने का काम किया। पर्वतीय नाट्य कला मंच आज भी उत्तराखंडी नाटकों का आयोजन करता है। यूट्यूब पर भी आपको ये देखने को मिल जाते हैं।

अब वो बात जो उन्हें महान इंसान बनाती है। दरअसल अपनी मौत से पहले ही नइमा ने कह दिया था कि उनके मरने के बाद उनके शरीर को जलाया या दफनाया न जाए। बल्कि इस शरीर को अस्पताल में दान कर दिया जाए। और ऐसा ही हुआ।… उनके शरीर को दिल्ली एम्स में डोनेट कर दिया गया। 

अपने आखिरी समय में नइमा दिल्ली में किराये के कमरे में रह रही थीं। हमारी राज्य सरकार को तो भनक भी नहीं लगी कि नइमा खान नहीं रहीं।… और सरकार को ये भी चिंता नहीं है कि वो इन विभूतियों के गीतों को सहेजे। खैर, अंधी-बैरी सरकारों से उम्मीद भी क्या करना। 

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