धगुली, हंसुली बच्चे अब पहनेंगे ही नहीं, पढ़ेंगे भी

सोशल मीडिया पर पिछले कुछ दिनों से एक किताब के कुछ पन्ने वायरल हो रहे हैं। इन पन्नों पर उत्तराखंड की प्रमुख भाषाओं में से एक गढ़वाली भाषा में बच्चों के लिए कविताएं लिखी गई हैं। हर उत्तराखंडी इन कागजों को एक उम्मीद के साथ शेयर कर रहा है।उसे उम्मीद है कि ये कागज सिर्फ कंप्यूटर से बने ना हों और कहीं पाठ्यक्रम हिस्सा हों। जब हमने किताब के इन टुकड़ों की पड़ताल की तो हमें जो पता चला वो हमारी तरह ही आपके चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान ला देगा।

गढ़वाली भाषा में किताब

गढ़वाली भाषा में किताब

मेरा बालपन मां

नाना न् धगुली दिनी

दादा न् हंसुली पैराई

दादी न् बोली- छुबकी पैर

नानी न् खुटुक पैजबी ल्याई

बाबा दगड़ी बाजार गयूं

बाबा न् मैंकु झुमकी मुल्याई

मेरू बालपन यों हाथों न् सजाई

धगुली… हंसुली…. छुबकी… पैजबी… झुमकी…. उत्तराखंड के हर शख्स ने इन शब्दों को सुना होगा। जिनका बचपन पहाड़ की वादियों में गुजरा है, उन्हें कभी उनके नाना ने तो कभी दादा ने धगुली और हंसुली पहनाई होगी। हमारे दादा-नाना के ये तोहफे ही अब हमारी आने वाली पीढ़ी को अपनी मातृभाषा सिखाएंगे। हमारी अगली पीढ़ी को ये उत्तराखंड की प्रमुख भाषाओं में से एक गढ़वाली भाषा सिखाएंगे।

पहले बात करते हैं इन वायरल पन्नों की। ये जो वायरल पन्ने आपको दिख रहे हैं, ये पौड़ी में पहली से 5वीं के बच्चों की किताबों का हिस्सा हैं। पौड़ी के जिलाधिकारी डीएस गबरियाल को इसका श्रेय जाता है। उन्होंने यहां पहली से लेकर पांचवीं क्लास तक गढ़वाली भाषा में पाठ्यक्रम शुरू किया है। पहली क्लास की किताब का नाम है. धगुलि, दूसरी के लिए हंसुलि, तीसरी के लिए छुबकी, चौथी के लिए पैजबी, पांचवीं क्लास के लिए झुमकि।

एक किताब का नाम झुमकी है

एक किताब का नाम झुमकी है

उत्तराखंड में दो प्रमुख भाषाएं बोली जाती हैं। गढ़वाली और कुमाऊंनी। दोनों ही भाषाएं अंतरराष्ट्रीय संस्था यूनेस्को की उस सूची में शामिल हैं, जिसमें लुप्त होने की कगार पर खड़ी भाषाओं को रखा गया है। कुमाऊंनी भाषा के संरक्षण के लिए भी प्रयास शुरू हो चुके हैं। यहां भी इसे पाठ्यक्रम में शामिल करने की पहल की गई है।

पौड़ी में तैयार की गई इन किताबों में उत्तराखंड की संस्कृति, वाद्य यंत्र, हीरो व अन्य कथा०कहानियों को शामिल किया गया है। इन किताबों के जरिये बच्चों को बचपन से ही अपनी संस्कृति से जोड़ना है। फिलहाल यह प्रोजेक्ट पाइलट बेसिस पर किया जा रहा है। अगर यह पौड़ी में सफल होता है, तो इसे राज्य की अन्य जगहों पर भी लागू किया जा सकता है।

गबरियाल कहते हैं कि मैं जैसे ही पौड़ी आया, वैसे ही मैंने इस काम के लिए एक टीम बनाई और इस टीम ने इन किताबों को तैयार किया है। 

गबरियाल जी की इस पहल और कोशिश की जितनी हो सराहना कम ही पड़ेगी। उत्तराखंड सरकार को चाहिए कि वह भी कुछ ऐसी पहल पूरे राज्य में करे। सिर्फ गढ़वाली के लिए नहीं, बल्कि कुमाऊंनी की खातिर भी। ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी मातृभाषा बोल सके। समझ सके और सहज सके। 

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