बिशनी देवी: आजादी के लिए जेल जाने वाली उत्तराखंड की पहली महिला

बिशनी देवी शाह। आपने शायद ये नाम सुना भी नहीं होगा। महज चौथी कक्षा तक पढ़ाई। १३ साल की छोटी सी उम्र में शादी हो गई। महज 3 साल के भीतर पति का निधन हो गया। पति का निधन हुआ तो ससुराल ने ठुकरा दिया। मायके ने भी अपनाया नहीं। वो छोटी सी बच्ची जिंदगी की तनहाइयों से संघर्ष करती रही और जिंदगी की चुनौतियों से लड़ती रही।

वो 19 साल की थीं। तब कुछ ऐसा हुआ कि वह कुमाऊं में आजादी के आंदोलन की नजीर बन गई। बिशनी देवी शाह, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज न हो सकी लेकिन उसने देश की खातिर अपना सबकुछ दांव पर लगाया।  

आजादी का संघर्ष और बिशनी देवी शाह
1857 में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह का बिगुल बज चुका था। आजादी के आंदोलन की शुरुआत हो चुकी थी। इसी बीच 12 अक्टूबर,1902 में बिशनी देवी शाह ने बागेश्वर में जन्म लिया। जब बिशनी देवी का जन्म हुआ तो कुमाऊं में भी आजादी के आंदोलन की अलख जग चुकी थी। छोटी बिशनी 13 साल की हुई तो उसकी शादी करा दी गई, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। शादी के तीन साल बाद ही पति का निधन हो गया। उत्तराखंड में इस दौर में पति का निधन होने का मतलब था कि महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए जाते थे। ऐसी महिलाएं संन्यासिनी बन जाती थीं। इन्हें माई कहकर बुलाया जाता था।

बिशनी देवी संन्यासिन बनने के लिए पैदा नहीं हुई थीं। अल्मोड़ा के नंदा देवी मंदिर में आए दिन अंग्रेजों के अत्याचार को खत्म करने के लिए बैठकें हुआ करती थीं। 1919 में पूरे देश में रौलट एक्ट का विरोध शुरू हो गया। इसी बीच महात्मा गांधी को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके विरोध में कुमाऊं परिषद ने कुमाऊं में रैली निकाली। कुछ साल बाद 14 जून, 1929 को महात्मा गांधी ने नैनीताल में एक सभा को संबोधित किया। उनके आगमन पर पहली बार महिलायें जुलूस और सभा में शामिल हुई. महात्मा गांधी और उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी के प्रेरित करने पर महिलाएं भी आजादी की लड़ाई में कूद गईं। बिशनी देवी साह भी इनमें से एक थीं।

गांधी जी की प्रेरणा से बिशनी देवी ने स्वदेशी का प्रचार-प्रसार शुरू कर दिया। स्वतंत्रता आंदोलन की इस लड़ाई में बिशनी देवी साह को दिसबंर १९३० में जेल भेजा गया। जेल में काफी यातनाएं भुगतनी पड़ीं, लेकिन उनका एक ही नारा था- 

जेल ना समझो बिरादर, जेल जाने के लिये
कृष्ण का मंदिर है, प्रसाद पाने के लिए”

जेल जाने वाली उत्तराखंड की पहली महिला
बिशनी देवी उत्तराखंड की पहली महिला थीं, जिन्हें गिरफ्तार किया गया था। जेल से छूटने के बाद भी वह आंदोलन से दूर नहीं हुईं। गांधी जी ने चरखा कथने का काम सबको सिखाया था। बिशनी देवी ने उस समय १० रुपये का मिलने वाले चरखे को 5-5 रुपये में घर-घर बांटे। बिशनी देवी शाह ने कुमाऊं में स्वदेशी आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए दो नाली जमीन और अपनी सारी जमा पूंजी लगा दी। वह आंदोलनकारियों के बीच संपर्क सूत्र का भी काम करती थीं। बिशनी देवी शाह को फिर 7 जुलाई 1933 को गिरफ्तार कर लिया गया. उन्हें 9 महीने की सजा हुई और 200 का जुर्माना भी लगा। वो पैसे नहीं  भर पाईं तो सजा बढ़ाई गई।

जब वो जेल से निकलीं तो फिर से स्वतंत्रता आंदोलन में जुट गईं। और आखिर तक आजादी के आंदोलन से जुड़ी रहीं। 15 अगस्त, 1947 को जब लाल किले पर तिरंगा फहराया गया, तो वह अल्मोड़ा में एक   शोभा यात्रा की अगुवानी कर रही थीं।

काफी दुखद रहा अंत
देश के लिए अपनी सर्वस्व दान करने वाली बिशनी देवी साह का आखिर समय काफी गुर्बत में गुजरा। उनका अपना कोई न था। 1974 में 73 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। 

10 अक्टूबर, 1930 को दैनिक अमृत बाजार पत्रिका ने उनकी कार्यकुशलता के बारे में लिखा:   

“समस्त उत्तर प्रदेश में अल्मोड़ा और नैनीताल आगे आये हैं, विशेषकर अल्मोड़ा। उसमें बिश्नी देवी की भूमिका सर्वप्रथम है। बिश्नी देवी अदम्य उत्साह और साहस से युक्त महिला हैं। अपने वैधव्य की रिक्तता को उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़कर पूरा कर दिया।”

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