फ्वां बागा रे… गीत के बारे में कितना जानते हैं आप?

फ्वां बागा रे… उत्तराखंड का ये लोकगीत आज न सिर्फ उत्तराखंडियों के लबों पर चढ़ा है, बल्कि देश के दूसरे हिस्से के लोग भी इस गीत को काफी पसंद कर रहे हैं। टिकटॉक पर फ्वां बागा रे बाकायदा ट्रेंड कर रहा है। सोशल मीडिया पर भी आपको सैकड़ों मैसेज इस गीत को लेकर आ रहे होंगे। इस गीत को आपने सुन तो लिया है, लेकिन क्या आप इस गीत के बारे में जानते हैं?… कैसे ये गीत बना? किसने बनाया? और सबसे पहले किसने इस गीत को गाया? आज इन सभी सवालों का जवाब हम आपको देने वाले हैं।

सबसे पहले किसने गाया?
फ्वां बागा रे गीत को सबसे पहले लोकगायक स्वर्गीय चंद्र सिंह राही जी ने गाया। इस गीत को खोजने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है। इस गीत को खोजने के पीछे एक रोचक वाकिया है, जो एक मंच से खुद राही जी ने बताया था। खैर उससे पहले हम आपको बता दें कि राही जी उत्तराखंड के पहले ऐसे लोकगायक कहे जा सकते हैं, जिन्होंने काफी प्रयोग किए। राही जी ने उत्तराखंडी गीतों के साथ हिंदी मिक्स कर ‘ढांगा रे ढांगा’ गीत गाया। अंग्रेजों की खातिर ‘तु किलै नी आयी’ गीत पेश किया। इस गीत में उन्होंने गढ़वाली के साथ अंग्रेजी का भी इस्तेमाल किया।… और हां. मत भूलिए कि पहाड़ के सबसे फेमस गीतों में से एक- चैत्वली भी इनकी देन है।

अब किसने गाया?
फ्वां बागा रे गीत को कुछ साल पहले स्वर्गीय पप्पू कार्की ने गाया था। जिसे नीलम कैसेट्स ने कुछ वक्त पहले ही यूट्यूब पर रिलीज किया। गाना रिलीज होने के बाद 10 लाख का आंकड़ा पार कर चुका है।

कैसे तैयार हुआ ये गीत?
इस गीत के तैयार होने की कहानी काफी रोचक है। एक कार्यक्रम में खुद में चंद्रसिंह राही जी ने बताया था। उन्होंने बताया कि कोटद्वार रेलवे स्टेशन पर एक भिक्षुक बैठा रहता था। वह गीत गाकर लोगों से पैसे मांगता था। लेकिन उनके गीतों की खासियत ये थी कि ये गीत उत्तराखंड के हाल बताया करते थे। राही जी बताते हैं कि सन 1985 में उनका कोटद्वार जाना हुआ। वहां उन्होंने भिक्षु, जिनका नाम-ज्वकि था। से पूछा कि आजकल क्या हाल हैं? ज्वकि ने कहा कि आज कल मनस्वाग लगा है यानि उत्तराखंड में बाग लगा हऐ। उस समय दुगड्डा, लैंसिडोन में बाग लगा हुआ था।

ज्वकि वहीं पर कुछ लाइनें गीत की इस संबंध में बना लीं। बाद में इन्हीं लाइनों को सुरबद्ध कर राही जी ने सबसे पहले एक कार्यक्रम में गाया।… और ऐसे ये आज एक अमर कृति बन गई। इस गीत और कोटद्वार का कनेक्शन आप इसी से समझ सकते हैं कि एक नाटक में कोटद्वार का सीन दिखाने के लिए सिर्फ इस गीत का इस्तेमाल किया गया।

कोटद्वार रेलवे स्टेशन पर एक सूरदास जी भिक्षा मांगते थे और गीत लगाते थे।- ज्वकि। ८४ में मुलाकात हुई। बाघ लग्यूं च। वो गीत लगाते थे उस बाग के।

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