‘मोती बाघ’ ने वो दिखाया है जो आजतक किसी ने नहीं देखा

उत्तराखंड के किसान पर बनी डॉक्युमेंट्री मोती बाघ को भारत की तरफ से ऑस्कर में भेजा गया है। ये उत्तराखंड के लिए गर्व का क्षण है। मोती बाघ पौड़ी गढ़वाल के 83 साल के किसान की कहानी है। जिसने 32 साल पहले सरकारी नौकरी छोड़कर अपने गांव बसने का फैसला किया। वो भी ऐसे वक्त में जब सब शहरों की तरफ पलायन कर रहे हैं। विद्यादत्त शर्मा ने खंडहर होते मकानों और बंजर होते खेतों के बीच एक मोती बाघ बनाया है, जिसे वह हमेशा हराभरा रखते हैं। लेकिन इस डॉक्युमेंट्री में सिर्फ इतना भर नहीं है। ये डॉक्युमेंट्री उन लोगों को भी एक कड़ा संदेश देती है, जिनका मानना है कि उत्तराखंड पर नेपालियों का कब्जा हो रहा है। आगे हम बता रहे हैं डॉक्युमेंट्री की वो बातें, जो ये सोचने पर आपको मजबूर करेगी कि अगर नेपाली न होते तो आधे से ज्यादा उत्तराखंड खंडहर और बंजर हो चुका होता।

मोती बाघके बहाने उत्तराखंड का सच
पौड़ी गढ़वाल का एक गांव है। गांव में एक बुजुर्ग महिला का निधन हो जाता है। अंतिम संस्कार की तैयारियां शुरू होती हैं, लेकिन तभी एक बड़ी समस्या सामने खड़ी हो जाती है। अर्थी को श्मशान घाट कैसे पहुंचाया जाए? क्योंकि गांव में बहुत ही कम लोग हैं… और जो हैं, उनके कंधों में इतनी ताकत नहीं कि अर्थी उठा सकें। आखिर में नेपाली मजदूरों को ढूंढा जाता है और वे अर्थी को अंतिम संस्कार के लिए श्मशान घाट पहुंचाते हैं। 

अगर आपने मोती बाघ का ट्रेलर देखा होगा तो उसी में विद्यादत्त शर्मा ये उदाहरण दे रहे होते हैं। और उनके उदाहरण का इशारा साफ है कि उत्तराखंडी अब सिर्फ गांव छोड़ नहीं रहे हैं बल्कि उन्होंने इनका पूरी तरह से त्याग करना शुरू कर दिया है।… कई उत्तराखंडी शहरों के हो चुके हैं और कइयों को शायद अब अपने गांव का रास्ता तक भी याद नहीं। ऐसे में ये नेपाली ही हैं, जो हमारे रोजमर्रा के काम निपटाने में मदद कर रहे हैं। 

विद्यादत्त कहते हैं…

ये नेपालियों की मेहरबानी है कि वो हमें खिला रहे हैं। अगर वो नहीं होते तो उत्तराखंड मुर्दाघर बन जाता।

क्यों कहा विद्यादत्त जी ने ऐसा?

पिछले साल ही पलायन आयोग ने पलायन पर अपनी रिपोर्ट पेश की। रिपोर्ट से पता चला कि उत्तराखंड के 900 से ज्यादा गांव ऐसे हैं, जहां अब एक भी इंसान नहीं रहता। रिपोर्ट से ये भी पता चलता है कि उत्तराखंड में जहां उत्तराखंडियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है, वहीं नेपालियों की मौजूदगी बढ़ती जा रही है।… और ये सच भी है। जिन मकानों को आपने खंडहर बना कर छोड़ा है, ये उन्हें घर बना रहे हैं। जिन खेतों को आपने बंजर किया है, ये उन खेतों में सब्जी उगा रहे हैं।… उत्तराखंड में जो थोड़े बहुत लोग रह भी रहे हैं, अब वो अपनी हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए नेपाली मजदूरों पर आश्रित हैं।… तो बताइए कि अगर कल नेपालियों को भगा दिया जाता है… या फिर वे यहां से चले जाते हैं। तो कौन आपके खंडहरों को घर बनाएगा… कौन बंजर हो चुके खेतों को हरा भरा रखेगा… और किसकी बदौलत आप अपने हर छोटे-बड़े काम को कर पाएंगे।

नेपाली मजदूरों की भी सुन लें

मोती बाघ को हरा रखने में न सिर्फ विद्यादत्त के बेटे लगे हुए हैं, बल्कि उनके साथ एक नेपाली मजदूर भी हैं। ट्रेलर में आप मजदूर को कहते हुए सुन सकते हैं कि ऐसी नौबत भी आ सकती है, जब उन्हें यहां से भगाया जा सकता है। लेकिन हमें नेपालियों से नफरत नहीं, बल्कि उनका धन्यवाद करना चाहिए कि उन्होंने हमारे उत्तराखंड को जितना संभव है, उतना जिंदा रखा है।… और अगली बार किसी नेपाली मजदूर को गाली देने से पहले ये जरूर सोचिएगा कि पलायन नेपालियों की वजह से नहीं, आपकी वजह से है। पलायन रोकना है तो पहले आपको लौटना होगा… और जब आप लौटेंगे तो न सिर्फ आपके लिए बल्कि उन नेपाली मजदूरों के लिए भी जगह हो जाएगी… याद रखिये हम देवताओं की भूमि में रहते हैं…वहां सबके लिए जगह है।… और हां… पहाड़ की तस्वीर बदलना अब आपके हाथ में है। 

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