जब फूट-फूट कर रोया टिहरी, सुंदरलाल बहुगुणा ने मुंडवाया सिर

‘‘शहर का हाल देखकर झटका सा लगा. ये तो जैसे भूतों का शहर बन गया है. जो नदी यहां लहराती थी वो आज सूखी और स्तब्ध कर देने वाली है. हमारा इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है कि जहां हमारा बचपन बीता वो आज मरघट बन चुका है’’

पुरानी टिहरी के मनोज रांगड़ 2005 में जब अपनी जन्मभूमि को देखने आए तो कुछ इन शब्दों में उन्होंने अपनी व्यथा बीबीसी को सुनाई। ये बात है 2005 की। लेकिन टिहरी शहर 2001 से ही डूबना शुरू हो गया था। कई सालों तक आंदोलन और सुप्रीम कोर्ट तक लड़ाई ले जाने के बाद भी टिहरी बांध बनना बंद नहीं हुआ। इसकी भारी कीमत चुकाई टिहरी वासियों ने।

टिहरी वासियों और पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा की लंबी लड़ाई भी बांध का काम नहीं रोक पाई। 2001 में बांध बनाने का काम फिर शुरू हो गया। बीबीसी हिंदी ने 9 दिसंबर, 2001 को इस संबंध में एक रिपोर्ट छापी। रिपोर्ट कहती है- हिमालय की तलहटी में बसा ऐतिहासिक शहर टिहरी गंगा में डूबना शुरू हो गया है।

इसकी वजह ये है कि शहर के पास गंगा की दो मूल धाराओं में से एक भागीरथी पर बने बांध के फाटक बंद कर दिए गए हैं। ये फाटक बंद किए बिना मुख्य बांध के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों का निर्माण नहीं हो सकता था।

फाटक बंद होने के साथ ही भागीरथी का बहाव उलट गया और वहां करीब चार किलोमीटर लंबी और पचीस मीटर गहरी एक झील बननी शुरू हो गई। कभी गढ़वाल की राजधानी रहे ऐतिहासिक शहर टिहरी के कई हिस्से इस पानी में डूब गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक इस दौरान टिहरी का जो क्षेत्र जलसमाधि ले रहा था, उसमें सुंदरलाल बहुगुणा का दफ्तर और घऱ भी था। करीब 10 हजार से ज्यादा लोगों के बेघर होने की आशंका खड़ी हो गई। 

अपने घरों और शहर को डूबते देख महिलाएं और बुजर्ग अपने आंसू नहीं रोक पाए। टिहरी वासियों ने कहा कि गंगा खतरे में है, लेकिन उनकी सुनने वाला कोई नहीं था। उधर, सुंदरलाल बहुगुणा भी इससे काफी आहत थे। उनके दुख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने इसके विरोध में 30 साल से बढ़ी अपनी दाढ़ी काट दी और बाल मुंडवा दिया। बहुगुणा ने इसे गंगा की हत्या कहा।

सिर्फ गांव नहीं, डूबी विरासत
टिहरी बांध की वजह से 125 से ज्यादा गांवों को जलसमाधि लेनी पड़ी। लोगों ने अपने पुर्खों के मकान और जमीन को डूबते देखा। साल 2006 तक लगभग पूरा टिहरी शहर जलमग्न हो गया। आखिरी विदाई यहां खड़े घंटाघर ने दी। वो घंटाघर जिस पर टिहरी के हजारों लोग टाइम देखा करते थे। वो घंटाघर जो टिहरी की विरासत थी। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक घंटाघर को पूरी तरह जलमग्न होने में 5 महीने लगे। रिपोर्ट के मुताबिक पुराना दरबार समेत कई गांव भी बांध की भेंट चढ़ गए।

बांध का विरोध क्यों हो रहा था?
टिहरी बांध बनाने के दौरान इसके फायदे गिनाए गए। कहा गया कि इस परियोजना से दिल्ली तक की बिजली और पानी की जरूरतों को पूरा किया जा सकेगा, लेकिन दिल्ली तक की जरूरत को पूरा करने के लिए टिहरी के 125 से ज्यादा गांवों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही थी।

टिहरी बांध के विरोधियों का तर्क था कि बांध से इस इलाके में भूकंप का खतरा बढ़ जाएगा। ये बांध 1991 में इस इलाके में आए भीषण भूकंप के केंद्र से सिर्फ़ 45 किलोमीटर दूर है। 1991 में आए भूकंप में क़रीब आठ सौ लोग मारे गए और साढ़े पांच हज़ार से ज़्यादा घायल हुए।

इसके बाद 28 मार्च 1999 को इलाके में एक भीषण भूकंप आया, जिसमें लगभग सौ लोग मारे गए. लेकिन सरकार थी कि बांध बनाने से पीछे नहीं हट रही थी। सिर्फ 125 गांव ही नहीं, 5200 हेक्टेयर जमीन, 14300 से ज्यादा परिवारों पर असर

जब घर बन गए खंडहर
डूबती टिहरी के मंजर को बीबीसी ने बयां किया। 2005 की एक रिपोर्ट में बीबीसी संवाददाता शालिनी जोशी लिखती हैं, आज जिस टिहरी में झील का हरा-मटमैला पानी फैला हुआ है, वहां कभी भागीरथी की धारा हिमालयी चट्टानों से होड़ लेती हुई, उन्हें पछाड़ती हुई कलकल बहती थी। और जो खंडहर दिख रहे हैं उन मकानों, मंदिरों, गलियों, चौराहों और चौबारों में जिंदगी के हर रंग धड़कते थे।

डूबे गांवों के लोग कहां गए?
डूब क्षेत्र में आने वाले लोगों को हरिद्वार में बसाया गया। इसकी शुरुआत 1979 से ही हो गई थी। हरिद्वार के पथरी क्षेत्र में पुरानी टिहरी के लोगों को बसाया गया। पथरी के अलावा रोशनाबाद और सुमन नगर में भी कई गांव के लोग बसाए गए। ऐसा नहीं है कि ये सब आसानी से हो गया।

टिहरी के लोगों को मुआवजे के लिए भी लंबा संघर्ष करना पड़ा। सरकार की गैर-जिम्मेदाराना रवैये को इसी से समजा सकता है कि 3 गांवों को 38 साल बाद पुनर्वासित किया गया।

खैर, टिहरी बांध के पीड़ितों को काफी लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। सरकार अपने वादे भूलती गई और लोगों को उसे उसके वादे याद दिलाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ा। सुंदरलाला बहुगुणा इसमें सबसे अग्रणी थे। टिहरी बांध ने हमारी विरासत को डुबो दिया। आज वो विरासत सिर्फ यादों में है क्योंकि इस विरासत को सहेजने में सरकार को कभी रुचि ही नहीं रही।

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