कालापानी विवाद: अंग्रेजों की बदौलत हम आज भी झगड़ रहे हैं

नेपाल और भारत के बीच एकबार फिर दीवार खड़ी हो गई है। इस बार की दीवार का नाम ‘कालापानी’ है। दरअसल भारत ने हाल ही में देश का नया नक्शा जारी किया है। इस नक्शे में धारचूला  से करीब 90 किलोमीटर की दूर पर स्थित कालापानी को भारत का हिस्सा बताया गया है। इस पर नेपाल में विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। और दोनों ही सरकारें कालापानी को अपनी जगह बता रही हैं… लेकिन साथ में दो भाईयों के झगड़े की तरह जल्द ही इस विवाद का निपटारा करने की बात भी कह रहे हैं। ये जो विवाद आज उठता दिख रहा है, दरअस यह काफी पुराना है और ये अंग्रेजों की देन है। इस वीडियो में हम आपको कालापानी विवाद की हर बात से रूबर करवाएंगे। 

क्या है कालापानी?
कालापानी भारत और नेपाल की सीमा है। कालापानी कई मामलों में अहम है। कालापानी से होकर ही चीन सीमा लीपूलेख को मार्ग जाता है। कालापानी काली नदी का उद्गम क्षेत्र है। ऐसी मान्यता है कि कालापानी में बदरीनाथ से भूमिगतजल निकलता है। ये जल जिस स्थान पर निकलता है। उसके ऊपर ही काली माता का मंदिर है। काली माता के नाम पर ही इस नदी का नाम काली नदी और काली गंगा भी खा गया है। नेपाल में इसे महाकाली के नाम से भी जाना जाता है। कैलाश मानसरोवर की यात्रा में एक पड़ाव ये भी पड़ता है।

क्या है कालापानी विवाद?
उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में 35 वर्ग किलोमीटर की जमीन है। नेपाल इसे अपना हिस्सा बताता है। वह इसे अपनी मैप में भी दिखाता है। वहीं, भारत भी हमेशा इसे अपना हिस्सा बताता रहा है। और मैप में भी दिखाता है। 1997 में कालापानी सीमा की शुरुआत की गई। इस दौरान नेपाल के लोगों ने इसका बड़ा विरोध किया। नेपाल काली नदी समेत 35 स्कॉयर फुट की जगह को धार्चुला जिले का हिस्सा बताता है। दोनों देशों के अधिकारी 1998 से इस विवाद को सुलझाने में जुटे हुए है लेकिन अभी तक इसका कोई पुख्ता हल नहीं ढूंढ़ा जा सका है।

कैसे शुरू हुआ ये विवाद ?
इस विवाद को शुरू करने का श्रेय भी अंग्रेजों को जाता है। दरअसल 1816 में नेपाल और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच सुगौली संधि हुई। तब काली नदी को पश्चिमी सीमा पर ईस्ट इंडिया और नेपाल के बीच रेखांकित किया गया था. आज यही काली नदी दोनों देशों के बीच सीमा तय करने का काम करती है। हालांकि कालापानी का क्षेत्र और काली नदी किसके हिस्से गई? ये संधि से कुछ भी साफ नहीं है। नेपाल भारत के नये मैप को सुगौली संधी का उल्लंघन बताता है। वहीं, भारत का कहना है कि ये पहली बार नहीं है जब हम मैप में कालापानी क्षेत्र को अपने हिस्से में बता रहे हैं। हमने तो हर मैप में इसे शामिल किया है।

अमाले ने दी विवाद को हवा
इस विवाद को हवा देने का काम 2009 से शुरू हुआ। इस दौरान नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी एमाले ने ‘कालापानी हाम्रो हो’ यानि कालापानी हमारा है, जैसे नारे लगाने शुरू कर दिए। कम्युनिस्ट पार्टी भले ही प्रदर्शन करने पर भी उतर आई थी लेकिन सरकार की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जाती थी।

अब प्रतिक्रिया क्यों?
अब इस विवाद को हवा दो वजहों से मिली है। दरअस नेपाल के प्रधानमंत्री ओली चीन के करीबी माने जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में भारत-नेपाल के रिश्तों में तल्खी आई है। दूसरी वजह है सोशल मीडिया। नेपाल के प्रधानमंत्री ने पिछले हफ्ते जब ये कहा कि हम अपनी जमीन का एक इंच भी नहीं देंगे। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि सबको संयम से काम लेने की जरूरत है और सुनी-सुनाई बातों पर न जाएं। हम इस विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझा लेंगे। लेकिन सोशल मीडिया पर आम लोगों को भड़काने के लिए वीडियोज और पोस्ट डाले जा रहे हैं।

नेपाल और उत्तराखंड के बीचे रोटीबेटी का साथ
भले ही इस विवाद का साया दोनों देशों के सिर पर मंडरा रहा है। लेकिन यहां सीमा पर रहने वाले लोगों पर इस विवाद का असर ना के बराबर ही पड़ा है। काली नदी के इस पार भारत सीमा में गुंजी, नाबी और कुटी आते हैं। इन गांवों के ग्रामीणों की कुछ जमीन नेपाल के कव्वा क्षेत्र में है। ग्रामीणों ने जहां कुछ जमीन यहां बेच दी है। और कुछ भूमि बटाई में दी है। सिर्फ यही नहीं, आज भी नेपाल और भारत के बीच रिश्ते लगते हैं। बेटे-बेटियां.. एक दूसरे के यहां बिवाये जाते हैं।

आज नहीं तो कल, दोनों ही सरकारें इस विवाद का हल ढूंढ निकालेंगी। लेकिन एक जमीन के टुकड़े के विवाद को लेकर आपस में दुश्मनी पैदा कर लेना ठीक नहीं। ये दो भाईयों को झगड़ा है। जिसका कोई न कोई समाधान निकाल लिया जाएगा।

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