हथिनी के साथ जो हुआ, वो आपके मनोरंजन की प्रवृत्ति का परिणाम है!

केरल में एक गर्भवती हथिनी को पटाखों से भरकर अनानास खिला दिया गया। वो हथिनी नदी में खड़ी रही और खड़े-खड़े उसके प्राण चले गए। जिन उपद्रवियों ने ये किया, वो इंसान के तौर पर उसके दर्द को महसूस नहीं कर सकते। क्योंकि हथिनी हमारी ज़ुबान नहीं बोलती। उसे आंसुओं के ज़रिये अपना दुख बताना नहीं आता। वो नहीं चिल्ला सकी कि उसे तकलीफ़ हो रही है और उसे बचाया जाए।

अब हम सब लोग शर्मिंदा हैं। उस हथिनी के लिए इंसाफ़ चाहते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आज जो घटना उस हथिनी के साथ हुई है। इसके बीज हम बचपन से ही अपने अंदर बो रहे हैं। कभी हंसी-मजाक के लिए तो कभी ग़ुस्सा निकालने के लिए हम सड़क पर सो रहे उस कुत्ते को लात मारने से गुरेज़ नहीं करते।

हम में से कइयों के लिए कुत्तों को, बिल्लियों को लात मारना, उनके कान खींचकर, उनका मुँह दबाकर उन्हें परेशान करना, मस्ती कहलाता है। कई बार हम अपने बच्चों को भी ये सब दिखाते हैं।  जब हम अपने बच्चों को ये दिखा रहे होते हैं, उस समय भले ही वो हंस पड़ते हैं। लेकिन आप ये महसूस नहीं करते कि आप उनके अंदर एक सबक़ डाल रहे हैं। सबक़ कि कुत्तों-बिल्लियों के साथ ऐसा मज़ाक़ किया जा सकता है।

कुत्तों-बिल्लियों या फिर अन्य किसी जानवर को परेशान करना भी एक शग़ल है। ये विद्या हम में से कई लोग बचपन से ही सिखाते आ रहे हैं। 

बेजुबानों को मारना आसान होता है। आसान इसलिए क्योंकि वो आपकी कोर्ट में जाकर गवाही नहीं दे सकते। वो आपकी मार खाकर सड़क से भागकर कहीं और चले जाएंगे। उनकी जितनी आवाज़ है, उसके दम पर रो जाएँगे। लेकिन आपको कुछ नहीं कर पाएंगे। 

हथिनी के साथ हुई घटना एक सबक़ है कि हम अपने बच्चों में जानवरों की इज़्ज़त करने का एक बीज बोएं। किसी कुत्ते को लात मारना शग़ल नहीं है बल्कि आप उसे तकलीफ़ दे रहे हो। किसी बिल्ली की पूँछ खींचकर उसे घुमाना शग़ल नहीं है। आपकी ये हरकत उसे दर्द देती है। 

इंसानों को सिर्फ़ इंसानों के लिए इंसानियत ना सिखाएँ,  बल्कि धरती के हर प्राणी के लिए इंसान के मन में इंसानियत होना ज़रूरी है। वरना इंसानियत और हैवानियत में ज़्यादा फ़र्क़ नज़र नहीं आएगा। 

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