जामा मस्जिद की वो 10 बकरियाँ, जिन्होंने हमें हीरा सिंह राणा दिए!

उत्तराखंड लोक संगीत के पुरोधा और आधार स्तंभ हीरा सिंह राणा अब हमारे बीच नहीं रहे। 13 जून की सुबह 2 बजे हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया। लेकिन हीरा सिंह राणा लोक संगीत की जो विरासत अपने पीछे छोड़ जा रहे हैं, वो हमारे लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं है। हीरा सिंह राणा को याद करते हुए इस लेख में हम उनके जीवन के कुछ अनछुई बातें आपके सामने पेश कर रहे हैं। हीरा सिंह राणा के लिए यही हमारी श्रद्धांजलि होगी कि हम उन्हें याद रखें और कभी भी भूलें ना।

तारीख़ 16 सितंबर, 1942। अल्मोडा के मानिला गाँव में एक हीरा पैदा हुआ। वो हीरा जो उत्तराखंडी लोक संगीत को जगमगाने वाला था। माता नारंगी देवी और मोहन सिंह ने उत्तराखंड के इस लाल को नाजों से पाला। मिडल तक गाँव में ही पढ़ाई करने के बाद हीरा सिंह राणा हर पहाड़ी युवक की तरह दिल्ली चले आए। रोज़गार की तलाश में। 

हीरा सिंह राणा 1959 में दिल्ली पहुंचे। यहाँ एक कपड़े की दुकान में नौकरी शुरू की। महीने की 5 रुपये तनख़्वाह पर। इसी दौरान आया वो वक़्त, जिसने हीरा सिंह राणा को बड़ी पहचान दिलाई।

1961 में गोविंद बल्लभ भाई पंत का निधन हो गया था। उनकी पुण्यतिथि पर दिल्ली में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में लाल बहादुर शास्त्री समेत उत्तराखंड के भी कई दिग्गज शामिल हुए थे। 

जब इस कार्यक्रम की तैयारियाँ चल रही थीं तो हीरा सिंह राणा अपनी ही अलग तैयारी में जुटे थे। हीरा सिंह ने इस कार्यक्रम के लिए बुरांस के फूल, काफल मँगवाए। सिर्फ़ यही नहीं, वो जामा मस्जिद गए और वहाँ से 10 बकरियाँ लेकर आए। साथ ही कुछ बच्चे इकट्ठे किए गए जो गारे खेलते थे।

कार्यक्रम के दौरान मंच पर कहीं बुरांस के फूल लगाए गए तो कहीं काफल रखे गए। और बीच स्टेज में खड़ी हुई बकरियां, जिन्हें वक्त-वक्त पर घास खिलाई जा रही थी… एक तरफ़ बच्चे गारे खेल रहे थे। और तभी हीरा सिंह राणा स्टेज पर आए… और उन्होंने गाया बाखरी लिली गीत।

इस कार्यक्रम में उत्तराखंड के प्रतिष्ठित शख़्स केशव पंत अपनी माता जी के साथ शामिल हुए थे। हीरा सिंह जी के गाने को सुनकर पंत जी की माता की आँखों में आंसू आ गए। 

माता जी की आँखों में आंसू देखकर लाल बहादुर शास्त्री जी ने पूछा- अरे माता जी क्या हुआ? आँख में कुछ चला गया क्या?

माता जी बोलीं, इस गीत ने मुझे अपने मायके की याद दिला दी। इस गाने को जिसने गाया है, मैं उससे मिलना चाहती हूं। 

और दूसरे दिन हीरा सिंह केशव पंत जी के घर पहुँचे और माता जी ने कहा कि जिस तरह का गीत तुमने गाया है, आज तक मैंने ऐसा गीत नहीं सुना। उन्होंने हीरा सिंह जी को इनाम स्वरूप 5000 रुपये दिए। आज की तुलना में ये रक़म लाखों में है। 

और वहाँ से हिरदा ने जो गाना शुरू किया तो वो आजीवन चलता रहा। बीमार रहने के बाद भी पहाड़ी लोक संगीत के लिए उनका काम चलता रहा। 

हिरदा ने कुमाउनी लोक गीतों के अल्बम रंगीली बिंदी, रंगदार मुखड़ी, सौमनो की चोरा, ढाई विसी बरस, हाई कमाला, आहा रे ज़माना जैसे ज़बरदस्त गीत गाए। बता दें कि हीरा सिंह राणा दिल्ली सरकार की तरफ़ से बनाई गई गढ़वाली, कुमाउंनी, जौनसारी भाषा समिति के पहले उपाध्यक्ष भी थे। 

हीरा सिंह राणा का जाना उत्तराखंडी संगीत के लिए बहुत बड़ी क्षति है। छिबड़ाट मालिक से उनके सुखद सफ़र की कामना करता है। 

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